एकाद मनखी

एकाद मोर-द्वार अज्युं भी खुल्या छन

द्वी-चार मनखी अज्युं भी तिबरी मा बैठ्यां छन

दूर-दराज तक बांज पड़ि गेन पुंगड़ी-पटळ।

पर कुछेक अगड़ी-पिछड़ी क्यार्युंमा कुटुळ फिराणा छन॥

 

कुछ अगने गेन कुछ पिछने गेन

पर जु भी गेन स्यु बोड़िकी नीऐन

कूड़ी क पठळ रोड़ीगे बळीण्ड रेगे

माटू छणे की चौक ऐगे

पर कुछेक अज्युं भी कुकुड़ी-कुकुड़ी चन्ने छन।

एकाद अज्युं भी उजण्या ते चिणना छन ॥

घौर-बौण संगीति इकसनी ह्वेगे

 

उबर-मंज्यूळ अब चिड़ियाघर बणिगे

म्वारू क जौळट गुरा बैठ्यां छन

बसुद फ्योड़ अब घौरम ऐगे

पर कुछेक अज्युं भी खुंड दथुड़ी पळयाणा छन।

एकाद अज्युं भी झाड़ी उळयाणा छन॥

 

कील-ज्यूड़ अर तंदला सून ह्वेगे

खुटबन्द गौड़ी-बाछी सड़क्यूंम ऐगे

मुंगर कुणुन्द इखुलि ह्वेगे

पटल्या झुकि की भी मूटिकेगे

पर कुछेक अज्युं भी टेक लगाणा छन।

एकाद अज्युं भी गुपुळ बणाणा छन॥

 

कटखळ-बुसुड़ अब याद मा रेगे

उर्खयळी-गंज्यळी अब बिरणी ह्वेगे

दांदण उजड़ीक पैर ह्वेगे

भीमूम्याळ सरि बरखा न छुळैगे

पर एकाद अज्युं भी पगार लगाणा छन।

कुछे करोल्युं मा गीत गाणा छन ॥

 

डॉ. ओमप्रकाश तिवाड़ी

(अनुसंधान अधिकारी)

उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड, देहरादून

(रैबासी-पठोला, यमकेश्वर)

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