अब नी रे ……… गढवळी कविता

अब नी रे ……….
मनख्यूं मा मनख्यात अर भयूँ मा भयात।
चखुलूँक च्युचाँठ अर गधन्यूक स्यूंसाठ॥
अब नी रे ……..

रुड्युंक बगत अर बाँजक डाल्युंक छैल।
एकी गुठ्यार अर द्यूरणि-जिठण्युक मेल॥
अब नी रे ……..

चा-क मूस्यायूँ कितुल अर पितलक गरु भड्डू।
ब्याखुन दांक ठण्डु कुरकुरा अर ह्युंदुक उ जड्डू॥
अब नी रे ……..

ग्वारा-कळ्या, जौळ, निसुड़, हौळ अर ज्यूँ।
ददा-क दगड़ी सिख्वा हळ्या अर तिरछ-बंग स्यूँ॥
अब नी रे ……..
मुट्ट, अन्ज्वाळ, माणि, पाथ, मण अर दूण।
चूनक रुट्टी अर मुर्याक पिस्युं लूण॥
अब नी रे ……..

ब्वे-दीद्यूँक धाण, हेरि सग्वड़ी अर लदी सारी ।
ब्यों- बरतिक बड़ू तव्वा, चसीणी-डिबुल अर बारी॥
अब नी रे ……..
पर्या, परोठी, रै, जंदिरी अर दबुल।
गंडसु, दाथी, कुटुळ, गैंती अर सबुळ॥
अब नी रे ……..

ढोल-दमौ मुसकबाज अर गौं-ख्वाळुक पैणु रिवाज ।
माळुक पत्ता मा दाळ-भात, पंगीतिक खाणुक अर रस्वांळुक जात॥
अब नी रे ……..
सतनज, नवरु, बक्की अर जगर्युंक जागर।
डिगिची, तसल्या, परात अर तांबक गागर॥
अब नी रे ……..

क़्वाद-झंग्वरुक सारी अर सुँगुर-कळुकी डार।
रात वाडुक जुगळी अर दिन चिलकणुक सार॥
अब नी रे ……..

कुटुण, पीसण, मंडण, दैं, उर्खयाळु अर खिलाण।
घस्यरूंक घासक बिठिक अर बिसौंणि बिसाण॥
अब नी रे ……..

डॉ. ओम प्रकाश तिवाड़ी
(अनुसंधान अधिकारी)
उत्तराखंड जैवविविधता बोर्ड, देहरादून

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One thought on “अब नी रे ……… गढवळी कविता

  • 19/12/2019 at 4:39 am
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    बधाई हो तिवाड़ी सर,
    बहुत सुन्दर कविता है

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