बेटी का मन की गेड़

जू बेटी हम थै
भैर बिटी बड़ी सुदंर
बड़ी बिगरैली
बड़ी बांद दिखेंद
वींका भितर ही भितर
बंद छन कखि
कतगै अबूझा सवाल
कथगा अबोल्या जबाब।

वा बेटी, वा भुली
हम सब्यूं बीच मा
रैकि बि
कथगा दा रैं जांद
तिरयां- सी
अजाण।

उगाड़ी सगदी क्या ?
वों ढक्या द्वार
खोली सकदी क्या
वे अबोला गेड़का
जू भितर ही भितर
घूंट दींद वा।

जू उमाळ मारि कि
मथि गौळा तलक
त आन्दा छन
पर उनी थूक दगड़ी
घट घूट दींद वा।

बोलण त चांद
पर नि बोल सकदि
कतगौ कै पाप, बुरै
अर कतगौं का पुण्य बि
अपणा आसूं दगड़
पे दींद वा।

वींका मन की या गेड़
आजै नि छन
ये ब्याळी परस्यों कि
गेड़ भी नी छिन
ये हजारो -हजार
सालों कि अलझी गेड़ छिन।

अपड़ा मन कि य गेड़
जब वा अफ नी खोलि सकदी
त खोलि सकदौ क्या तुम ?
शायद कबि ना।

पर जै दिन
बेटी अपड़ा मन कि
यू गेड़्यूं तै खोल साकली
ता समझयां
स्माज बदलि ग्या
दुनिया बदलि ग्या ।।

प्रेमलता सजवचाण

गढविळ साहित्य मा एक इन उफरदी कवियत्री श्रीमती प्रेमलता सजवाणा की बेटियूं मन की गेड़ अपर कविता माध्यम बिटी खुलण एक बौत सुनदर प्रयास यीं कविता बिटी कर्या छन, त ल्यावा पढौ उकी कविता। उन ये शीर्षक पर अपरि येक कविता पोथि छपयीं, ये मा इनी बौत से कविता छन जू मन तै झकझोळी दे करदन। अगर क्वी भी पाठक् उंकी यीं कविता संग्रहै तै पढण चांद या लीण चांद त रंत रैबार से भी सम्पर्क कर सकदन।

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