कब_तलक_जी_राळ ( गढ़वाली कविता)

.#कब_तलक_जी_राळ”. बिरण भोर मुण्ड रेकि कब तलक जी राळ। उजड़खु गोर खुट टेकि कब तलक़ जी राळ। कभी त आला

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अहा! पकिगेनि सैदा काफळ, खट्टा- मिठ्ठा रसीला काफ़ळ

अहा! पकिगेनि सैदा काफळ खट्टा- मिठ्ठा रसीला काफ़ळ। चरचरू लूण जब मिलदा यूँमा गिच्च बिटी लाळ चुवांदा काफ़ळ। काफळै डाळी

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“खडु उठाऽ— अग्वाडि बढ़ा” युवा कवि अशोक जोशी कि स्वरोजगार पर कविता

अशोक जोशी स्नातक की पढै करदू एक ज्वान भुला। अशोक गुरुकुल कांगडी हरिद्वार मा स्नातक कु छात्र च अर भौत

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बण-जंगळ( गढ़वळी कविता) लिख्वार श्री ओमप्रकाश तिवारी

बण–जंगळ बण-जंगळ हमरी न्हेंन ह्वेरुक भी च। डाळ-बूट हमरी न्हेंन ह्वेरुक भी च। न हमन डाळी लगे न पाणी दे पर डाल्यूंन हमते फलूक दाणि दे फ़ौंट खेंचीन, पत्ता रुंडीन रिंगळा-पिंगळा फूल चुँडिन बेडु-तिमुल हमरी न्हेंन ह्वेरुक भी च। फूलुक डाळी हमरी न्हेंन ह्वेरुक भी च॥   बण काटिकबणांग लगे पख्याड़उजाड़ीकसड़क बणे जंगळ उग्टैकीरूखु डांड बणे रौल-गधन्यूकपाणी सूखे रौल-पाखहमरी न्हेंनह्वेरुक भी च। सीलुड़-तैल्वड़हमरी न्हेंनह्वेरुक भी च॥   तौळ बाँज-कुळें उळे, ऐंछ खर्सू-अँयारनिपटे रूंद डाळयूंक असधरी, लाल बुरांशकफुलून ढके जानबरुकि कुटुम्दरी तितर-बितर करिन

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कख द्याख, (गढ़वळि गजल)

दोस्ती करण वल़ुंन्,कैकी औकात कख द्याख। दिल जब मिल ही गैन,फिर जात कख द्याख।। बरबाद हूणsक छन बहाना लाख ईंं

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