गढवाळी गजल

पौ बुन्याद का ढुंगा जब प्वतरा ह्वै जंदिन ।
तिबरि डंडळ्यूं खुणै वो खतरा ह्वै जंदिन ।।

ज़िकुड़ा मा ढुंगु धैरि जग्वळणा रवां जौंथै ।
व्वी कळ्यजा का कतरा-कतरा कै जंदिन ।।

निपल्टु कैरिगीं अपणों जो ढुंगा फरकैकि ।
पर पुजै मा वो घौर सोला सतरा ऐ जंदिन ।।

त्यारा बूढ-बुढ्या भि नि दिखेंदा यूं भितर्यूं ।
तिबरिकि घुघत्यूं मा जांठा छतरा रै जंदिन ।।

कोरट मैरिज कैरि बाय-बाय टाटा बोलिगीं ।
आळा जळ्वठौं मा जलम पतरा रै जंदिन ।।

मनखि गिरह अंगुळि बालिस्त मा नपेणु चा ।
बड़-बड़ा आदिम निमकणा कतरा रै जंदिन ।।

तेरि खुद जिकुड़ि मा इन चिसंगी सि लगांद ।
नि पूछ,कळ्यजा का कत्गा कतरा ह्वै जंदिन ।।

भैर ग्वारा अर भितर काळा छन सब “पयाश”।
लोग मुक ध्वै-धाकि साफ-सुतरा ह्वै जंदिन ।।

लिख्वार

© पयाश पोखडा

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