अपणी घरवली अर रिश्तेदार  सरकरी नौकरी कना देहरादून मा अबला असहाय लखया पहाड़ मा

सदनी नी रैदी कैकी सरकार
चार दिन की चांदना फिर अंधेरी रात
जब कैकी नी सुणनी खैरी
किले लगाणा जनता दरबार।
सब्यु न ब्वाली राजधानी गैरसैण
सरकरी नेता लोगू न देहरादून सूण।

सदनी नी रे रावण कु अहंकार
कन कन तै जनता न ठोकर मार
तातू तातू दूध न गिच्चू फुक्यान्द
चार दिन कुणी किले बणल फुदय्यानाथ
जनता न यख पकड़ी कब्बी फूल
त कभी ल्याई उन हत्थु मा हाथ
सदनी नि रौंदू ज्वनी कु राज पाठ।

हाथी भी चढ़ना छ्यायी पहाड़
पर नि टप साकी यख उकाळ।
कुर्सी लड़नी रायी अपरु दगडी
सैकिल हैंडिल यख कैन नि पकड़ी।

जनता यख च भौत चालाक
कब कैक फूटी जाव यख भाग
एक दूसर यख पीठ पन
करदन बडू बडू स्याळ घाव
कु कख पलटी मार जाव
यख नी क्वी यूक मोल भाव।

जु छ्यायी कब्बी यख जरूरी
उतै नि सुमरदु क्वी भी आज
नौ छमी नारेण क बिरड़ी गेन सब बाट
जु कबि कुर्सी मा बैठी
करद छ्यायी चबै चबै बात
आज उ काफल अर आम खैक
कटणा छन लोगू दगडी दिन रात।
जौन कभी नि द्याखि आज तक पहाड़
सी कना छन पलायन रुकण बात।

अपणी घरवली अर रिश्तेदार
सरकरी नौकरी कना देहरादून मा
अबला असहाय लखया पहाड़ मा
अपणी कटणी यूकी मौज बहार मा
यू ल्याखन विकास ह्वावू या ना ह्वावू
हम गुलछर्रा उड़वा अर जनता जाव भाड़ मा
सच्ची बुलदन लल्लू बैठयू हर डाळ मा।

“मनखी” कलम बटी

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