हिमालयी वियाग्रा की भरपूर पैदावार के बाद भी भारत इसके उपयोग में पीछे, जानें वजह

हिमालयी वियाग्रा जड़ी बूटी का सबसे अधिक उपयोग चाइना में किया जा रहा है। भारत में इसका कम उपयोग हैरानी की बात है। जीबी पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान ने अपनी स्टडी में पाया कि इसका सबसे अधिक उपयोग चाइना कर रहा है।

पिथौरागढ़। हिमालयी वियाग्रा यानी यारसा गंबू की पैदावार भारत में दूसरे नम्बर पर होने के बाद भी इसका उपयोग यहां अन्य देशों के मुकाबले काफी कम मात्रा में हो रहा है। इस जड़ी बूटी का सबसे अधिक उपयोग चाइना में किया जा रहा है। भारत में इसका कम उपयोग हैरानी की बात है। जीबी पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान ने अपनी स्टडी में पाया कि इसका सबसे अधिक उपयोग चाइना कर रहा है, जबकि ताइवान जहां इसकी पैदावार बिलकुल भी नहीं है, वो दूसरे नम्बर पर है।

करीब 5 हजार मीटर की ऊंचाई पर होने वाला यारसा गंबू कई मायनों में कारगर है। दवाईयों से लेकर इसका इस्तेमाल ऊर्जावर्धक के रूप में होता है। दुनिया में इसकी पैदावार देखें तो अकेले चाइना में 95 फीसदी यारसा गंबू पैदा होता है। जबकि भारत में 2 फीसदी नेपाल में डेढ़ फीसदी और भूटान में आधा फीसदी ही यारसा गंबू होता है। यारसा गंबू के इस्तेमाल की बात करें तो सबसे अधिक इसका उपयोग चाइना करता है, जबकि जिस ताइवान में इसकी पैदावार बिलकुल भी नहीं है, वहां इस पर शोध और इसका उपयोग जमकर हो रहा है। जीबी पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान के निदेशक डॉ। केएस रावल ने बताया कि संस्थान की स्टडी काफी उपयोगी साबित हो सकती है। यारसा गंबू को लेकर माइक्रो लेबल तक अध्ययन किया गया है। साथ ही रावत कहते हैं कि भारत में इसका पूरा उपयोग किया जा सकता है। लेकिन शोध के लिए सरकारी सहयोग की आवश्यकता है।

कहां कितना हो रहा है प्रयोग
जीबी पंत संस्थान की स्टडी में पाया गया है कि बॉयोकेमिकल के बतौर चाइना 61 फीसदी, ताइवान 17, हांगकांग 5 और भारत में सिर्फ 2 फीसदी ही इस्तेमाल हो रहा है। यारसा गंबू से बॉयोमेडिसन बनाने में भी चीन का ही दबदबा कायम है , जबकि दूसरे नम्बर पर ताइवान तीसरे पायदान पर जापान है। मोलेक्यूलर बायलॉजी के क्षेत्र में भी चीन पहले पायदान पर है, दूसरे में जापान और तीसरे में भारत है। इकोलॉजी में भी पहले नम्बर पर चाइना दूसरे में ताइवान और तीसरा नम्बर भारत आता है। नम्बर ऑफ स्टडीज की बात करें तो, चाइना ने इसको लेकर 480 अध्ययन कर लिए हैं, जबकि ताइवान ने 76, जापान ने 50 भारत ने सिर्फ 43 अध्ययन किए हैं।यही नही चाइना इससे अपनी आर्थिकी को मजबूत करने में भी पहले नम्बर पर है। जीबी पंत संस्थान की स्टडी से साफ है कि भारत को अभी भी इस दिशा में काफी काम करना है। ताकि देशवासियों को इस बेसकीमती जड़ी का पूरा फायदा मिल सके।

 

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