तुम भुना त ठीकी ह्वालु ( गढवळी कविता)

तुम भुना त ठीकी ह्वालु…..
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मिता सारै रौ कि कैन त आण च
क्वी त द्वार मोर ख्वाललू. ……..
जिओर भुना जाण वला नि बौडदा.
अब तुम भुना त ठीकी ह्वालु……. ………..
जैन भी आण स्वार्थ से आण.
हिस्सा किस्सा अर वाडु खुज्याण.
गडवलि बणि कैन नि आणु
जैन भी आण अंग्रेज बणि आण.
बच्ये नि सकदा बस बीन्ग जालु
अब तुम भुना त ठीकी ह्वालु……………….
पुरणा दिनो की याद कारलू.
अफ़ु भी खुदै हमथै रुवालु.
जू भी पुरणु घर बौडी आलु.
नै जमना त बस सेल्फ़ी ल्यालुक़.
जू भी तखुन्द बटि घार आलु.
हैसण कु जुगाड अर खाणु ठुन्गार लिजालु.
अब तुम भुना त ठीकी ह्वालु…………………….
जैन भी आण तमाशु लगाण.
हमरि सुख चैन हर्ची जाण.
द्वी दिन कु ऐकी घपरौल कैजाण.
एक दिन फ़िर उन्द चलि जाण.
हमुन त सदनि रैण यखि.
न ऊन हेरण पिछनै कभी.
न हमुन पीठ फ़रकाण.
फ़ूका राजि खुशी रयान जु जख ह्वालु
हम भी किलै रूला.कैका बान
जु आलु त आलू नि आलु त नि आलु.
कैकु बाटु रुक्यू नी हमरू
जिवोरुन कुछ यन ब्वाल….
अब तुम भुना त ठीकी ह्वालु……………….
……………………….. ©®सन्दीप गढ्वाली

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