जलम भूमि तुमरी

जैं जनम भूमि मां जनम ल्याई,
जैं जनम भूमि मां ग्वाया लगाई
जै जनम भूमि मा लिखण पढण सीखी
जै जनम भूमि क छुयौं क पाणी प्याई
वा जनम भूमि तुम थै लगाणा छा धैई।

ना जावा ना जावा छोड़ी ई गढ देव भूमि
इनै सुणा जरा बुल्यूं माणा, कख जाणा तुम
सैंती पाली क अब विरण न ह्वावा तुम
ई गढ देव भूमि क खातिर कुछ करां करम।

लौटी क आवा बौड़ी का आवा गौं गुठयार बुलाणा छन
यक द्याखों बांज बुरांस की डाली खिलणा छन
गोठ खेत अगड़ पिछड़ी तुमरी बाट दिखणा छन
नागरजा नरसिंह कुल देवी तुम थै याद करणा छन।

या गढदेश की धरती छा तुमरी समलौण
ऐ जावा अपण गॉव बौड़ी की अब यखी अपण जीवन बितौण
चौं डांडयू की हवा, गंगा जमुना क पाणी प्यावा
अपण रोगी शरील थै यख एैक निरोगा बणाव।

        सरा दिल्ली बम्बई मा हुयीं छा धुंवारौली
        शहर नगरू मां हुणु छा मारकाट अर घपरोली 
        गौं मां आवा अपण चौक तिवरी मां फिर कछेड़ी लगावा
        नौन नौन्याल थै अपण गढदेव भूमि क अरसा चूड़ा चखावा। 

        अब्बी बगत छा बगत पण अपण घर गौं फिर बसाव
         जैं नौकरी क खातिर तुम जाणा छ्याव वी नौकरी यकी कमाव
        यख कूड़ी पुंगडी सरा विरासत तुमरी छा ई तै बचाव
        आवा भुलौं आवा दगड़या सब्ब मिली की फिर देव भूमि बणाव।

हरीश कण्डवाल ’ मनखी’

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