नि होण्यां पिरेम ( कहानीकार बलबीर राणा “अडिग” )

 गवंरा देवी* उल्टी बदिन सर्री धर्ती स्येति ह्वेगी छै अर मथिबटिन माँ गंवरा एक वक्का-वक लगीं छै जुळका मा जुळका फरौंण पर। एक बंकापुरी। यनु लगणु छै सीं कति दिने बदहजमी थामी छै जु आज सब्बी उल्टी करि हल्की होण चाणि ह्वो। सुबेर बटिन छा ढळकी तलक तीन फिट से मथि थौंर्यूं छै ह्यूँ। डाळि बोटियां कबैर तलक त मैदान मा डट्यां छाँ पर अब तौन बी हार मानी मुंड झुक्याली छै। बाटा घाटा एक रमथमकार सैंणा सपाट, हाँ धारा नाळा अर गदरों अज्यूं हिम्मत धरिं छै जोन अपणी औनार बचयीं छै। पौन पंछी जडुन बिबलाणा छाँ, वूंका बिबलाट से बगत-बगत पर डालौं बटिन फताक फताक ह्यूं बड़ा थ्वपका भुयां झड़दा। पंछियूँ मा घिंदुड़ि ही इन छै जु खिलपत ह्वे हौंसणी छै किलैकी वींकु घौर आज ह्यूँ बदिन बच्यूं छै। वा बिच बिच मा कूड़ा छाँत से र्फफराट करि भैर औन्दी अर कै डाळी हियूं झाडी चट भितर ठिया पौंछ जान्दी जन हौरि प्वथलौं तैं ब्वनि हो कि मि बी दिलैर छौं।

आज सोबन सिंह रौत (स्वबनु) ननि याद कन ममकोट जयूं छै ननि भिज्यां बुड्या ह्वेगी छै ना जाण अब अग्ने दर्शन ह्वलू, कि ना। ममकोट जर्रा डानो मुल्क छै, ये वास्ता तख बर्फबारी जादा होन्दी छै। दिन मा भात खाणा बाद स्वबनुल मामी तैं बोलि मामी जान्दू छौं जति देर कर्लू बाटू वति जादा मुश्किल ह्वे जैलू द्यो कि बि बिद्दा होणे मनसा नि दिखणी। उन बि छुट्टी कमति छ घौरपुन अज्यूं भिज्यां काम निबटाणु रयुं। तुम जणदा छाँ मैता अर छुट्टी दिन पूसा मैनों जन घाम अब्बी अयूं अर अग्वणि* चलग्ये। उन बि पराबटी नौकरी छुट्टी प्वथलौं जन गौळु, मामिऽल बि जिद्द नि करि स्या बि समझणी छै कि काम धाम यीं झड़द्यो* मा क्या होण पर भाण्जा परिवार दगड़ घौर अयां त झड़द्यो मजा गरम रजै।

      सोबनु नानी उबरा गेन, ननि घर्या ढ्यपरां ऊनी म्वटा चुटका* भितर अंग्रेजी आठ हुयीं छै दिसाणा बगल मा चुलाणाउन्द बाँजा लखड़ें गरगरी आग जगणी छै। सोबनुल ढक्याणा भैर बटिन ही खुट्टा बानी सेवा लगे, ननि मि जान्दू छौं अपणु ख्याळ रख्या। ननि सटपट खडि उठि, ओ म्यारा सोबनु आग ताप। बुबा ख्याल त अब मथि वळु धर्लु उन्दारो बाटू लग्यूं, न जाण कखमु राशन पाणी निमणी जावूं, तू तै सेरों मा नालोडें* भलि सै-समाळ कर्यां। अर अपणि ब्वै तैं ब्वल्या पंचमी मा जरुर अयां तेरा बाल बच्चा उन्द ल्यी जाणा बाद तैन मैत नि देखी। क्या कन बुबा ब्वारी ल्ये किन बी वींकी आफद आतुरी वीं पर ही रै। पर ! नयुं जमानु च लाटा तुमुन बी बाल बच्चा पढौंणे च, भल करि त्वेन, नि राला हमारा चारे जिन्दगी भर यूँ भैंस बखरों पिछने। ननिल चैंठि पर हाथ लगै भुक्की प्येनी अर ब्वलाण ब्वलाण रूण बैठिन।

सोबनुल ममकोट मा सब्यूँ दगड़ बिदै लिनी अर छतरू वारी निकलग्यूँ घौरे तर्फां। सात आठ किलोमीटर बँकापुरी* चार फुट्या ह्यूँ मा हिटद-हिटद थौक बि लगीं छै अर ठंडै बदिन खुट्टा बि टटकारिगा छी, उन त फौजी गमबूट अर कोट पैरयूं छै पर मैनस पाँच डिग्री मा हाड़ मासो शरील हिकमत से गरों होण लगी छै। वा गर्जम्-गुरजे ह्यूँ हराणे कोसिस कनु छै कि एक किलोमीटर बाद द्वारखाळा मरोड़ा औण वळु छै तखि कैका मरुड़ा मा आग तापी घौर तक पौंछणु तौ ल्यूला।

द्वारखाळ से पैली मज्याणी धार मा पौंछिन्दा तैन जर्रा रुकी रमथमकार हुयीं धर्ती मा बाटू जैजा ल्येनी त तैकि नजर धारऽक ठिक तौळ धुंवा पर टीकिन। मन मा स्वचणु छै कि यख त पैली क्वे ग्वोठ साळि नि छै, कै मवासी ह्वली यु साळि*। उन बी यीं बाटा वा आठ साल बाद औणु छै, घौर गौं मा बि जनसंख्या बड़ण से लोग बाग गौं से भैरे तर्फां बड़ण लग्यां छाँ। सौजि-सौजि मरुड़ा जगा पक्का मकान अर मरुड़ा भैर जंगला तर्फां सर्कण लग्यां छाँ। अंदाज लगायी कि यु जगा मज्याणी गौं का फत्ते ल्वारे जमीने सींत पर छै अर नोना बाळा बि तौंका छकी छै सैद तौंका नोना सर्की ह्वला यीं तर्फां ।

धार होण से खूब रौंत्येळी छै वा जाग। तख बटिन पल्ला धारा सब्बी गौं टक दिखंन्दा छाँ। चला जैकि बि साळि ह्वो बस्ती त छैं छ क्वे रिख बाग थोड़ि छ ! कौन सा मिन तख ठिकाणु बणोंण, यखमु ही जर्रा आग तापी अग्ने सर्कणु तौ लियीं जों। सोंबनु साळी भैर पौंछिन।

साळी ड्वार ढक्यां छाँ वेंन भैर बटिन धै लगेन, ऐ नालडौ, छौं क्वे भितर, भितर बटिन क्वे प्रतिक्रिया नि ह्वेन, फेर ड्वारा संगल खड़के बोलि अरे भितर वलों भितर ऐ जौं। तबारी एक छः सात साले गोरी उजळी नोनिल ड्वार ख्वळि, मुख पुतलण्यां गात पर एक झगुली औनार कुछ जाणी जन लगणी। नोनिल बोलि तुम क्वो छाँ ? बाबा भितर आण ध्ये मितें भिज्यां जड्डू लगिग्ये। तबारी भितर बटिन एक जनानी आवाज ऐ, आवा आवा भितर ऐ जावा। क्व ह्वला ? जनानिन कै बच्चा तैं डांटिं फुंड सौर रे, तै चुलाणा उंद् खुट्टा न क्वोच। क्वे औणु तौं तैं बैठण ध्ये।

सोबनुल छतरु बंद करि मोरि मा बूटों बर्फ झाड़ी बूट ख्वली अर भितर चलग्यूं। साळी भितर अन्ध्यारू ह्वयूं छै ठन्डा बदिन ड्वार म्वोर सब चम्पत बुज्यां छाँ, भितर गव्वोरु भैंसों घंडुळा आवाज दगड़ गौंत म्वोळे चिराण औणी छै। हाँ ग्वोठ* गरम त खूब छै ह्वईं। जनानिन ब्वली आवा बैठा आग तापा, कख बटिन छाँ औणा ये बँकापुरी ह्यूँ मा? मथि पज्याणी गौं ममकोट छै जयूँ ननी याद कन, ननि बुड्यां ह्वेगी मिन बोली दर्शन कर्योला, सोबनुल जबाब दिनी। क्या ममकोट वलूँ बल्द् नि छाँ बाँधयाँ जु इन मौसम मा बाटा लगिन?

जनानी मुख नि दिखेंणु छै पर सोबनु तैकि बाज भलिऽकी पच्छ्याणणु छै। तैकि बाज बि जनानिन पच्छयाणिली छै पर जननी जात शर्मयाळी फट नौं गाड़ी नि ब्वलि साकि। सोबन सिंगन यकीन कना वास्ता बाना मारि छवटि नोनी तैं बोली बेटा तै ड्वार खोल जरा धुंवा होणु भिज्यां। नोनिन झट सालि ड्वार खोली, उज्जयलु भक करि भितर ऐ, जन उज्यळु तें बि भैर जड्डू ह्वो लगणु। साळि भितर अँध्यारु पर्दा उठि।

जनि जनानी अर सोबनी नजर मिली त द्वियाँ हकदक ! एक टक एक हैका मुख बटिन आँखा ना हटो। आँख्योंऽन बि किलै हटण छै, तौं आँख्योंन न जाण कति स्वेणा सुपन्यां देख्यां छाँ। जैकि गवै वीं धर्ती छीणा कूणा आज बि माया अदालत मा निर्भे ह्वे दे सकदा। घामा दिनों बांजों छैल, ह्यून्दा तड़तड़ा गैठा, मधुमासा बुराँसी फूल, बैसाखा मैना काफल अर चैमासे घीड़ मा उड्यार आसरौ, कैतें बि पूछ सकदा छाँ। घुघती, न्योळी, हिलांस आज तौं विजातीय पिरेमियों कथा एक सांस मा सुणे सकदा छाँ। ब…ब.. बसंती यु तेरु घौर छ क्या ? सोबनुऽल हकलै ब्वलि। बंसतिन मुंड हिलै जबाब दिनी।

जब काफी देर तलक द्वियूं प्वतळि झपकोणु तैयार नि छाँ त छव्टी नोनिल पैल करि, माँ ड्वार बंद कैर दियूं ? हमारा ग्वरुं तैं स्येळ* लगग्ये। तबारी तलक भितर खूब स्येळिन भरीं छै। नोनिल ड्वार ढकिन। अब द्वियाँ गिचू चुप। क्वे कुछ न ब्वलों, ना छुंवी ना बात। सोबन चुपचाप आग मा जुराब सू सुखाणु लगिन अर बसंती आगे झोळ मा तैका हाथ देखणी रेंन। वा हाथ आज कत्गा परै अर अजाण छाँ लगणा, कब्बी यूँ हाथ तैका अपणा जन छाँ, तौं हाथों वीं स्पर्श मैसूस करि तैकु गात सर्सराण लगीं छै।

एक चारेक सालो नोनू चुलाणा बगल मा अजाणा मनखी देखी चुपचाप बैठयूं छै, निथर इनि उमरा नोना भ्ज्यिां चुल्खुन्दा होन्दन। द्वी नोनि ह्वो नोना चुलाणा बगल दिसाण मा सियां छाँ ।

एक दां फिर वीं छव्टी नोनी चुप्पी त्वड़ी। ऐ माँ यूँ तैं चा त बणें दये। सोबनुल जबाब दिनी ना बा ना मि चाय नि पैन्दू। बसंतिन मने-मन ब्वली चा हाथ क्या गाते बि प्येन्दा पर जात पाते कूड़ी नि फुक्येन्दी। स्वोच से भैर ऐ वींन बेटी तैं वोली बाबा बिठ लोग हमारा यखे चा नि प्येन्दा, अर अटगि-अटगी सोबनु तैं कुशल पूछी, भ..भ.. भल च तुमुऽ, तुमारा बाल बच्चा ? आठ साल पैल्यों ‘तू’ आज तुम बणिग्ये छै। सोबनुऽल उनि अटगि-अटगी जबाब दिनी कुशल छ ब.. बसी..। हां बसंती तैं प्यार से वा बसी त बुलान्दू छै बाळापन से। अब ना ब्वला बसी,  बसी त मल्यौ डार दगड़ पर्यां मुल्क उडिग्ये, बसी ध्वीड़ बणि जात बिरादरी शिकार्योऽन मार्याली। यख बसी ना बिजू लाले कज्याण बसंती देवी छ।

सोबन सिंगल क्वे जबाब नि दिनी जादा छुंवि बत लगै वा अतीत तैं जगाण नि चाणू छै। अतीत जगि वर्तमान नि ह्वे सकदू, न वींमा इत्गा हिकमत छै अर ना नीति कि बसंती तैं दियूं वचन निभै साकू। अतीत तैं साकार कन परालै बर्त जन लगणु छै, परालै बर्त पर गाड़ पार कने सामर्थ नि होन्दी।

आज एक गदरु द्वी फागों मा बटिं कब्बी ना मिलण वळि धराओं मा बगण लगी छै, अब एक रस्ता द्वी फाड़ ह्वै जात बिरादरी हाईवे दगड़ मिलग्ये छै। इन ह्वावो कि पुराणी छुंवीं पतौळी यादों कुट्यारी खुली जौं अर वीं पुटगा बटिन लाल किरमुला निकली होणी खाणी गिरस्थी पर चिपटी जौं, यखमु बटिन जल्दी जाण मा ही भले च। वींन थैला बटिन द्वी बिस्कुटा पैकेट अर मुठ्ठी भौरीं टॉफी निकाली छवटा नौनयालों हाथ पर धरिन, जुत्ता पैरी भैर निकलग्यूँ। बसंती मुंडौ पल्ला समाळी पिछने बटिन भैर ऐन।

भैर अब बर्फ गिरण बंद ह्वेगये छै व्यखुनी पिंगळा घामल ह्यूँ चूळा कांठी स्वोनु जन चमकणी छै। प्वथ्ला अपणा घ्वोळ छोड़ि उंड फुन्ड फर्फराट कन लगिन कि कखी कुछ गाळु मिल जों घ्वलणा बाळा तैं। पल्ली पार हरसिंगा खर्के तर्फां अन्वाळ* वखरों तैं ल्ये-ल्ये करि हिंसर किन्गोड़ा कांडा काटी देणा छाँ, भुऽखा बखरों अर चिनखों मिम्याट से यनु लगणु छै कि कखि बाग गोठ मा पड़िग्ये ह्वलु। यूँ अन्वाळों तैं बर्खा झड़द्यो कुछ नि बिणान्द जीव पाल्यूं सत वूं का पुटगें धीत से ही कमेन्दू। “जब खालु ख्वेरी तब खयेलि थ्वैरी”।

सोबनु तै साळी बटिन चाक्काचूर दस पन्द्रा कदम घौरा बाटा उन्दार दौड़ि फिर एक दां पिछने मुड़िन, बसंती साळी डिस्वाळ मा चुप खड़ि द्खणी छै अर वींकि नोनी हाथ हिलोणि छैं, तैंन बि हाथ हिलै अर मुंड खाड़ डाळी अग्ने बाटा लगग्यों। बसंती हालतों बिष्लेषण अर वूं दिनों याद मा सोबनु कमांड दियूँ जन रोबोट बाटा लगिन।

गोरी चिट्टी जून जन गोल मुखड़ी उनि छै पर गळौड़यां भितर चलग्यां, लौंचि ज्वानी भरयूँ गात डिलडौल अब खंतणो मा टंगी डमी जन दिखणी छै। घ्वीड़ काखड़ जन चंचळ चित थीर गिरस्थ्या स्वेणी बणग्ये छै। गोल भंरी छत्ती न जाण कख बुस्येग्ये छै। पच्चीसे उमर मा चार लड़क्वाव। गरीबी खिखताट मा जीवन तांगे ताण लगाणु छै। बसंती जीवन न फूलों हार छै न कांडों दिसाण। दया से जादा अपणी मर्दांगनी पर सरम छै औंणी। दोष कैकु छै ? समै, समाज या द्वीयूँ कु। कौंळी उमरा सौं करार तैं क्या जीवनो बाटु पुर्येणु हक नि छ ? हक छै त हमारा पिरेम तैं किलै नि मिली। पुराणा पिरेमे तपण मा शरील यति गर्म ह्वेगी कि वा नि चिताणु छै कि ह्यूँ मा हिटणु।

अग्ने बाटोऽक ह्यूँ बखरों खुरड़ों से कटि सौंग ह्वेग्ये छै अर वा यादों भौंर से भैर औणें कोसिस कनु छै। पर ! बित्यां दिन एक-एक करि चलचित्र माफिक समणी दिखेणा छाँ।

सोबनु अर बसंती एकी गौं का छाँ, गौं बीच मा एक गदनू छै, जात बिरादरी बागा बोर्डंर। वलि वार ठाकुर बामणे बस्ती, पल्ली पार हरिजन बस्ती। द्वीयूं सार, जंगळ, मरुड़ा कठ्ठी छाँ। वोड़ संतरा सब्यूं कठ्ठा। सब्यूं गौरु बखरा इकठ्ठा चरदा छाँ। द्वी बचपन से घौर बण इस्कूल का दगड़या। बाळापन मा कागजे नाव बगोण अर पिठ्ठु ख्योलण से सुरु ह्वे दोस्ती कबैर ज्वानी पैली सीढ़ी मा पौंछी डाळों छैल अर पाखों पिछने बैठण बठिन पता नि चलि।

द्वीयूं सल्ला इस्कूल मा ही ह्वे जान्दी छै, इस्कूल से धनतुरन ऐ चट घास लखड़ा बाना बण चलि जान्दा, वा मुरुली पर नरेन्द्र सिंह नेगीजी कु गीत बजान्दू, क्वो भग्यान ह्वलो डांडियूं मा इनी भोलि बंसुरी बजाणु, बसंती दगड़ गुणगुणादी ह्वलु क्वी बिचारु मि जनु नखर्याली बांद रिझाणु। द्वियां न जाण कबैर तलक कृष्ण गोपी बणि माया संगसार मा ख्वयां रैन्दा। कैका बुबो घास लखड़ू, गौरु बखरा। अन्ध्यारा होण पर सोबनी एक ठंगरु कान्धी रखद अर बसंती द्वी पूळी घासेऽ पीठ लगै अपणा घौर चली जान्द। बल कैन ठिक ब्वली कि प्यार अंधू होन्दू। अब इत्गा त यूं कौंळा मायादार बिंगीग्ये छै कि हम विजातीय छाँ हमारु एक होण मुश्कित छ, यु पिरेम नि होण्यां पिरेम छ पर माये माया कख छौडण वळि।

उन उमर इत्गा रसिक होणे नि ऐ छै, किशोरपना बाद शरील मा बदलौं होण पर न जाण कनि अगासमात्री लगलु बणग्यां। द्वीयूँ तैं पता नि चली।

ब्वलदन ईस्क मुस्क जादा दिन तक नि छिपदू। ह्यूँ मा हग्यों एक दिन सै ह्वे जान्द। दुन्यें नजर यूँ नवाण मायादारों पर लगिन। सर्रा इलाका मा सोबनी अर बसंती बांदा किस्सा लगण लगिन। एक दिन गौं सरपंचजिऽन सोबनी बुबा तैं बोली यार गजे सिंह मि यु क्या सुणु, नस अब्बी खड़ी नि ह्वेन अर तड़तड़ाट सुरु ह्वेगी। अपणा नोनू ब्यौ कैर भाई झट करि निथर डुमसौंण* लगलू त हम गौं इलाका मा कैतैं मुख दिखोण लेख नि रैला, नाक कटि जाली। अरे तै मास्ता तैं समझो जात बिरादरी क्या होन्दी। मुख बी बखी मारी जान्द जु सुंघण लेख होन्द। बच्चू ल्वार तैं मिन समझाली।

तै दिन बटिन द्वीयूं पर घौर मु सगत हिदैत मिली अर पैरा लगण लगिन। पिताजिन कच्चा लंगोट कु परिणाम ढंग से बिंगेन। सोबनु केवल हाँ मा मुंड हिलाण रयूं। वीं साल बारा पास कना बाद गजे सिंगल सोबन तैं गौं का एक भै दगड़ दिल्ली पठ्यांणु बिचार करि, घौर बटिन मुख लुकयूँ रैलु त कुछ दिन मा तै छौरी रुप कु मौ टुटी जालु।

दिल्ली जाण से पैली वा जंत जोड़ करि बसंती से मिली अर वींतैं बिस्वास दिलैं कि खूब मेनत करि दिल्ली मा बड़ी नौकरी लगलु अर एक दिन त्वै तैं दिल्ली ल्ही जैलु सदानी वास्ता। फिर यीं जात पाता गौं मुख कब्बी नि दय्खुला। चार घंटा तक द्वीयां गैठा ढांगा पिछने जीवन का स्वेणा बुणण रयाँ। बसंतिन जाण बगत ब्वनी छै कि मि तेरु बाटू द्यखलु अर वा तैका हाथों भुक्की ल्ये बचन देणु रो कि जरुर ल्ही जैलु। तैन सीं गौरी मुखड़ी का चैंठी तिल से रुवांसु ह्वे बिदै लिनी।

दिल्ली जाणा बाद कुछ मैना त वा उनि ढपकणु रौ फिर एक कम्पनी मा नौकरी कन बैठग्यूं अर दगड़ मा कमप्यूटर कोर्स भी। असली जीवने सुरुवाती लड़ै मा द्वी साल कने गुजरा सोबन तैं पता नि चलि। तीसरा साल मात्र पन्द्रह दिने छुट्टी अयूं त पता चलि बसंती कै हैका ह्वेगी।

सोबनी अर बसंती चर्चा बाद गौं वळुंन बसंती बाबा बच्चू ल्वार पर जोर डाळी कि नोनी हाथ पिंगळा कैर द्ये निथर गौं का होर नोनु बि बिगड़णु खतरा च। अगर कै हैका बिठा नोना पर तैकु रुपो जादू चलि त त्वेतै गौं निकाल मिल जालू। बच्चू ल्वारऽन स्वोचि बिचारी, कि नोनी यू रंगरुप ह्वो ना ह्वो परिवार तैं  संकट मा न डाळी द्यों, यींतैं कैका किल्वाड़ा बांधण मा भले च। बच्चुन अठारह साले बसंती स्कूल छुड़ै अर पार मज्याणी गौं मा बिरादरी का फत्ते ल्वारा नोनु बिजु तैं बिवैन। बसंती पर यति हिकमत नि छै कि वा खुल करि सोंबनु जग्वाल कन वळा बचने बात कैर साकू।

लौंचि च्येली पाळी बंधी गौंड़ी जन गेन्डू खींची हैका घौर बंधीग्ये। बिजू बि सैर मा पराबटि नौकरी कर्दू छै। बसंती का रुप-रंगल बिजु घौर उज्यळु ह्वेगी छै तैन कब्बी नि स्वोचि कि बसंती जन बांद तैकी कज्याण बणली। वा रुप कु इनु रसिया निकळी कि नोकरी छोड़ी घर्या ह्वेगी। अब साल साल भर पोथुलोन घ्वल्याणु भर्येणु बैठिन। परिवार बड़िन पालण पोषणों भार बडिन बिजुन अपणु पुस्तैनी काम अणस्यळु पकड़ी अर कुछ चिरान चुरान करि गिरस्थी गाड़ी खिंचणु बैठिन। बसंती चुपचाप मैंसा खुट्यों मा खुट्टा धरीं गरीबी उकाळ खिंचणी रैन।

      सोबनी पन्द्रह दिने छुटटी अद्दा मा छोड़ी दिल्ली चलग्ये छै, अब तेतैं समाज अर समाजिकते सच्चे पता चलि अर कुछ सैरों मा ठोकर खाणा बाद प्यार कु बुखार बी कमती ह्वेगी छै। तीन चार साल बाद तैकि नौकरी कम्पनी मा कमप्यूटर ओपरेटर का तौर पर पक्की ह्वेन, दिन रात मेनत करि उम्मीद से अग्ने परमोशन अर कमे होण लगिन। जब ब्यौ कनु टेम ह्वे त नजीका गौं वळोन कानि सूणि अपणी नोनी हाथ नि बडैन। “झूट लाण धार पार जु निभी जौं दिन चार”, अर घौर वळोंल धार पार दुसात गौं बटिन ब्यौ मांगी। वा देखण बि नि अयूँ  तैन ब्वली छै कि तुम जनि बी ल्याला मितैं मंजूर च।

आज ब्यौ हुयां चार साल ह्वेग्ये छाँ एक द्वी सालो नोनू छै ब्वारी सरीता भलि स्वाणी निमाणी होनहार मिली। बल, “सुबेरो मुख ध्वयूँ अर बाबो ब्यौं करयूँ फैदामंद होन्दू”। आज अरेन्ज मैरिजे प्रसांगिगता यीं लव मैरेज अर लिव इन रिलेशनशिप का दौर मा बि बिजेता छ। सरिता तैं सोबनु पैल्ये पिरेम कानी पता त चलिन पर तैका बिगरेला पिरेम अर पति धर्मऽल सिकैत कनु मौका नि दिनी। “सुबेरो भूल्यूं ब्यखुन्दा घौर ऐ जान्द त वींतैं भूल्यूं नि ब्वलै जान्द”।

पिछला साल सोबनुल दिल्ली मा फ्लैट खरीदिन अर परिवार वखि सिफ्ट कैरी। गिरस्थी दुन्यां दगड़ खूब दौड़ी अर भागणी छै। समै का पंख भला बुरा सब्बी दिनों तैं दूर सात समोदर पार उड़े ल्यी जान्द जख बटिन वापस औंणे ना सास ना आस।

सोबन सिंह अब बसंती कु बाटू बिसरी क्या निरपट भूलीग्ये छै। आठ साल जनी जु्ग ह्वेगी “निराणी पुराणी बात”। पर आज अचाणचक यीं भेंटन लौंची उमरा डाम दुख्याली छै। यति लम्बा सुमिरण मा वा अपणा द्येळी सीढ़ियां चड़ि खौळ मा पौंछिग्यूं।

अँध्यारु ह्वेगी छै अर तैकु द्येळी भैर ह्यूँ सफेदिन अर भितर ट्यूब लेटा सफेदिन चमकणी छै तति मा सरिता गरम पाणि अर चा गिलास ल्ये समणी खड़ि छै, जब द्वी सालो बिट्टू पापा आ गळे, पापा आ गळे कैरी झट दादी कौळी बटिन फाळ मारी तैकि कौळी मा ऐग्यूं, तब मज्याणी से लेकर घौर तके तन्द्रा टूटिन, अब वींतैं वर्तमान पिरेम पर रौंस अर नि होण्यां पिरेम पर रोस छै लगणु ।

 @ बलबीर राणा अडिग

* दशोल्या शब्दों अर्थ :-

गवंरा देवी – बर्फ कु पुज्यनीय नौं, अग्वणि – भौत पैली, झड़द्यो – जाड़ो दिन, चुटका – ऊन गरम थुलमा, नालोड़ – बाल गोपाल, बँकापुरी – बिगैर रुक्यां लगातार बर्फ गिरण, साळि – ग्वोठ गौशाला

स्येळ – शीत लहर, अन्वाळ – गडेरिया, लड़क्वाव – बच्चों वाली, डुमसौंण – अवैध संबन्ध कु अभियोग

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