नरसिंग बुगठ्या ( गढ़वली कहानी , मनखी कलम बीटी)

आज बिरजू गोर बखर लेकन दूर बण जयूं छ्यायी। वै बण मा दूर दूर बिटी लोगू गोर बखर चरणा कुणी आंद छ्यायी। बिरजू ढुंग मा बैठी कन बखरू जुगळी कनू छ्यायी, तबरी झाड़ी मा वै तै बुगठ्या रमण सुणे ग्यायी। बिरजू न हरके फरके कन द्याखी त अपर बुगठ्या त नी छ्यायी अर ना कै गौं ह्वाळू छ्यायी। वैन सोची कि कैक बखरू दगड़न यू बुगठ्या बिगळे (अलग) ग्यायी अर यख छुटी ग्यायी। रूमक पड़ी ग्यायी त बिरजू गोर बखर लेकन ड्यार कुणी बौड़ी ग्यायी। वैक दिमाग मा कत्ती विचार ऐन कि यू बुगठ्या कैक ह्वाल, सरा गौं गुठयार याद करी द्यायी कि फलण क ह्वाल या फिर कैक ह्वाल, हूंद करद आखिर मा वैन स्वाची कि जैकू भी ह्वाल अफी लेकन जाल।

गुठयार मा जब बिरजू घरवळी बैसखी न बखर तंझला पर बंधण मिसेन त उ बुगठ्या दूर दूर जाणा, बाद मा वीन पछाणी द्यायी कि यू अपर बुगठ्या नी च अर ना गौं करों कै मौं क च। वीन सोची कि क्वी बिवरी रै ह्वाल कखी बिरजू रस्ता पर ही सौदा करी दे ह्वाल।

बैशखी- हे पुष्पा बाबा आज कखन डंडे कन आव, कैन चिपकायी तुम पर यू मरण्या बुगठ्या। तुम तै लोग ब्वाळ समझी कन सुदी चिपटे दे करदन लुंगत्या मुगत्या बुगठ्या।

बिरजूः- त्यार कपाळ, बिना जण्या बस अपरी लगाणी रैंद, यी बुगठ्या कै ग्वेर मनन बिगळे ग्यायी, अर हमर बखरू दगड़ ऐ ग्यायी, जैक भी ह्वाल अफी ऐकन ली जाल।

बैशखी- क्वी सुदी अपर बोली कन लि जाल तब तुम पर ही बकै आली।

बिरजू – अब्बी तबरी तै कीलू पर बॉधी देदी, बकै तब कि तब मा ही दिखे जाली।
( बैशखी न कीलू पर बॉधी द्यायी अर वैक बाद रात मा उब्बर सब बखरू दगड़ उ बुगठ्या भी बॉधी द्यायी)।

रात सब्यूं न खै पे कन, भाण्ड कूंड ध्वे कन, छांछ छोळी कन अपर अपर छानी मा सीणा कुणी जाण लगी गेन। बिरजू पडौस मा राजपाल घर छ्यायी। राजपाल घरवळी रूकमा भी अपर काम निपटे कन सीणा कुणी तिवरी मा जाणा छ्यायी कि तबरी उं तै गौं नजीक बांस जू गौं आणा बाट पर छ्यायी वख बिटी टॉर्च उजळू आण द्याखी। रात 10 बजी गे छ्यायी, इथगा देर रात कैक आण सवाल ही पैदा नी हूंद। राजपाल तै बुगठ्या बारे मा पता छ्यायी कि आज बिरजू ग्वाठ मा बिरण अणजाण बुगठ्या अयूं हो न हो क्वी वै तै चुराण कुणी त नी आयी।

मुड़ी कुड़ मा कौंशा अर झबरी अपर अपर तिवरी मा बैठीकन छुयीं लगाणी छेयी, तबरी मत्थी तरफ बटी धै लगी कि हो बिरजू बिरजू, तुमर चौक मा क्वी टॉर्च लेकन क्वी मेहमान या क्वी आदमी आयी, तुमर कोड़ी पैथर तरफ जू चाय बुट्या च वी रस्ता आणा छ्यायी टॉर्च जगै कन। अपर उब्बर देखी ले भाई कखी बुगठ्या त नी चुरायी कैन। झबरी अपर नाती दगड़ी छेयी अर कौंशा दगड़ी छुयीं बात लगाणी छेयी, धै सुणी कन भैर ऐन, बिरजू अर बैशखी न उब्बर ऐकन द्याख त बुगठ्या अपर कील पर ही बंध्यूं छ्यायी, सरा गौं मा हल्ला ह्वे ग्यायी कि चोर अयां छन। सरा रात सब्ब अपर अपर घऽर डरी कन बैठ्या रैन, कौंशा झबरी, बैशखी, बिरजू सब्बी बैठीकन बुगठ्या बाना बिज्यां रैन। राजपाल अर वैक घरवळी सब्ब चुप्पचाप अपर भीतर बैठ्या रैन डऽर बिचर भैर भी नी ऐ सकीन।

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जन कन करी कन रात कटी सुबेर सबसे पैल सरा गौं बिरजू घऽर मा बुगठ्या बात खबर पुछणा कुणी ऐन। सब्यूं न ब्वाल कि रात उ टॉर्च ह्वाळ छ्यायी त कु छ्यायी। अब जब सुबेर घस्यर घास लीणा कुणी जंगळ गेन त उख भी सरा चर्चा बुगठ्या अर रात चोर बारे मा हूणा रायी। गौं से कुच्छ दूर एक झुपड़ी बणे कन रग्गी अपर परिवार दगड़ी रंद छ्यायी। रग्गी घरवळी अर बेटी भी घस्यरूं दगड़ी घास लीणा खातिर जयां छ्यायी त उन जब सूणी की रात मा गौं मा क्वी चोर टार्च उजळू करी कन बुगठ्या चुराणा कुणी गेन त उ हॅसण लगी गेन। उंक हॅसण देखी कन बकै घस्यर अकबकै गेन। अरे भुन्द्रा तुम क्योक हॅसणा छ्याव यख त गॉं मा सरा हाम मच्यूं च सब्बी डर्या छन अर तुम हॅसणा छ्याव। भुन्द्रा हसंद हंसद किस्सा सुणायी कि ब्याळी रात म्यार बुब्बा अर हूण ह्वाळ म्यार सुसुर एक होर आदमी शिकार खिलणा कुणी गौं तरफ गे छ्यायी, वी रात मा बांस बुट्या मा मुर्गा पर टॉर्च चमकाणा अर बंद कना छ्यायी। यी लोग छ्यायी क्वी चोर नी छ्यायी। यी सब्ब सूणी कन सब्ब हंसण लगी गेन। वैख बाद सब्यूं न घऽर मा ऐकन रात चोर बाबत बतै तब जैकन सब्यूं जान मा जान आयी कि चोर नी छ्यायी बलकण शिकर्या छ्यायी।

लेकिन सवाल अब्बी जखे तक छ्यायी कि यू बुगठ्या कैख च। गौं मा यू चर्चा विषय बण्यू छ्यायी। अब्ब क्वी बुनै कि बिरजू ये तै अफकुणी रख देयी, क्वी बुनू की बेची देयी, दारू अर कचमोळी खाणा ह्वाळ रगरयाणा छ्यायी कि सस्तू मा मिल जाल त कम से कम बॉटी लगी जाली। यी बात अडोस पडौस गौं मा भी खबर जब ग्यायी त गिरधरी मास्टर जू खूब शौकीन छ्यायी कचमोळी खाणा क उ भी सौदा कना खातिर बिरजू घर म ऐ ग्यायी। बिरजू कुणी ब्वाल कि बता क्या दीणन तै बुगठ्या क ठीक ठाक लगै दे, द्वी दिन पळी लेले बस, उन भी तुमर पळयूं बुगठ्या नी च। तबरी हैं बाट बिटी दूसर गौं रमेश लाठू लेकन बिरजू चौक मा ऐ ग्यायी अर ब्वाल कि सीमान काका, कख मिली तुम तै यू बुगठ्या सरा जगह ढूंढी पर बुगठ्या नी मिली। यी बुगठ्या नरसिंग कुणी सिरयूं छ्यायी हमर, चार दिन बाद घडयळी लगणन तब येक बलि दीण हमुन। चार दिन पैल ही मोल लेकन ऐ छ्यायी परसी बखरू दगड़ चराणा कुणी लौं पर यी बिगळे ग्यायी अर तुमर बखरू दगड़ी ऐ ग्यायी। मी तै खबर मिली कि तुमर यख क्वी बिगळयूं बुगठ्या अयूं अर परसी म्यार बुगठ्या हरचयूं च।

गिरधरी मास्टर न ब्वाल कि यार रमेश कन बात कनू छेयी कन मा मान जवां तेरी बात यकीन। जरा यीन बतौ कि कन च त्यार बुगठ्या रंग च कतरू सींग छन, तब ही त हम मनला। बिरजू न ब्वाल कि कख छ्यायी त्यार गोर बखर चरणा कै बगत हरची त्यार बुगठ्या। रमेश न सब्ब सच्च सच्च बतै द्यायी अर नरसिंग सौ गठीन तब सब्बी तै यकीन ऐ ग्यायी अर वैक बाद सब्यूं न सलाह मसौरा करी कन रमेश बुगठ्या बौड़े द्यायी, गिरधीर मास्टर भी अपर झवाळा उठै कन अपर गौं चली ग्यायी। द्वी दिन बाद रमेश यख घडयळी लगी अर सुबेर नरसिंग बलि दीये ग्यायी अर जगरी पाठ हिस्सा अर बामण मुंडळी लेकन जाणा छ्यायी बाकि सब्ब पंगत बैठी कन बुगठ्या रस्याण लीणा छ्यायी, पंगत मा सुण मा आयी कि गिरधरी मास्टर भी बैठ्यूं छ्यायी।

हरीश कण्डवाल मनखी कलम बिटी।

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