पारू ( गढ़वली कविता )

❝पारु❞
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ज्यू जान जिकुड़ी मा म्येरि बसगे तू पारु
पिंडळा पत्तो पाणी सी मनमा थमगे तू पारु

लाल लालेंगी लम्बी लटुल्यूं कू जादू त्येरु
ह्युंदे हिमाळ मा हियूं सी दिलमा जमगे तू पारु

काळी कळछणी सी कजराळी आँख्यूँ अपड़ी
प्रेम की पैलुड़ीन बड़ा प्यार से में कसगे तू पारु

दारू दवै दवाखाना बी नि कैरि साकी रोग दूर
मीठी मीठी मिठास सी मुखड़ीन डंसगे तू पारु

निखणी निसेणी नहेणी धुयेण्यू निसाब कै ज़ा
म्येरि मन माया मा मृग्नयेनी सी फंसगे तू पारु

बणाक लग्या बोण मा बुरांस सी बणि खिले तू
सुंदर सतरंगी साड़ीन पृथ्यू सिरंगार रंचगे तू पारु

खुदेड़ खुदमा खुदे कि त्येरि दियी खैरी खाणू च
बिरणा गौं बिरैणी ब्योली बणी सजगे तू पारु

लिखवार रावत ❝खुदेड़❞

 

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