अब त चकाचौंध मा गौं तकन सिमटी रै गेन तीज त्यौहार, गौं मा भी पलायन की पड़ी यू पर मार

अब त तीज त्यौहार बस फॉरमलटी जणी रै ग्यायी, न उ रंग न उ ढंग। बाजारवाद अर पलायन कारण आज पहाड़ की लोकसंस्कृति खज्याण लगी ग्यायी जै कारण लोक परंपरा हरचण बैठी गेन। पैल गढवाळ मा बग्वाळ की बड़ी महत्ता छेयीं, अर वै मा छ्वटी बग्वाळ खास मने जांद छेयी, लेकिन अब छ्वटी बग्वाळ मनाण ह्वाळ लोग शहरू मा बसी कन सोसल मीडिया, अर गिफ्ट देकन, अर द्वी चार पटाखा फोड़ी कन दीपावली तै मनाणा छन, सीखाबोरी हुयीं च। बग्वाळ त अब गौं मा मनयांद, उख भी पलायन अर चकाचौंध मार तीज त्यौहार पर पड़ी ग्यायी, पर जब तकन दान सयण छन तब तकन रस्म पूर हूणी छन।

बग्वाळ उत्तराखण्ड कू एक यन गौं कू पर्व च जू शरद ऋतु क आण पर बडू जोर शोर से मनये जांद। एक उ जमन छ्यायी जब पहाड़ की सामाजिक- आर्थिक परिस्थितियां आज जणी नी ह्वेकन अलग छेयी, वै बगत मनोरंजन साधन भी नी छ्यायी, तब रोज काम खातिर प्रकृति पर निर्भरता ज्यादा छेयी, तब वख लोक व्यवहार यूं परिस्थितियूं पर टिकी हूंद छेयी। लोग बग्वळी मौका पर घर भैर भीतर लीपण पुतण, नै अनाज कूटण पीसण, घऽर भैर भीतर द्यू जळाण। ये बगत थड़िया चौफळा गीत चौक मा शुरू ह्वे जांद छ्यायी। कखी कखी रात मा जनकि टिहरी मा भैलो की अपणी एक अलग सुंदर खेल खिले जांद छ्यायी। भैला या भैलो खिलण कुणी भ्यूंळ क स्योळू बणी रस्सी या बेल पर कुळैं क छिलका या भ्यूळ क क्याड़ मुरयड़ बणै भैलो बणये जांद। वैक बाद यूं भैलो तै कै उंच्ची जगहा मा लि जैकन मशाल जणी जळे कन नाच गान दगड़ी गोळ गौळ घुमये जांद छ्यायी। भैला खिलद बगत नाच गान पूर गौं मा रात भर हूणा रंद छ्यायी येकू अलग ही उत्त्साह हूंद छ्यायी, कखी कखी इगसी दिन भी भैलो खिले जांद।

Loading...

बग्वाळ प्रकृति अर संस्कृति कू संरक्षण अर वैक पूजा प्रतीक च

बग्वळी दिन गौं मा गौं वंश की सेवा कना कू रिवाज च, धन तेरस दिन रात मा गौं वंश कुणी बाड़ी झुंगर, भात जौ आटू ढिंडी बणये जांद सुबेर यूं मा बारह बनी क फूल जैमा ग्वळी, कपीन, मरसू, सतराज, अर होर सब्ब जंगळी फूल न परात या ठुपरी तै सजै कन ढोल दमो दगडी सरा गौं क गौं वंश तै जिमये जांद। गौं वंश जिमाण तकन व्रत रखे जांद। गौं वंश तै जिमाण से पैल उंते हल्दी पिटै, वैक बाद उंक सिंग पर सरसों तेल, खुरड धुये जंदीन अर बळद तै पक्वड़ी खिलै कन सरा गौं वंश तै जिमये जांंद। छ्वट बछरू तै फूलू माळा पैनये जांद। आखिर मा तब सब्बू मा पाणी छिड़की कन बुले जांद कि ’धीत ल्याव धीत ल्याव गाड़ गदनू कू पाणी सुख गे, डांडी कांठी कू घास सुखी गे, अनाज भीतर धरे गे खूब धीत ल्याव बरगत ल्याव’’। यूं मा नौन दान सयण सब्ब मा उत्साह दिखणा कुणी मिलदू। प्रकृति खातिर अपणी सेवा प्रकट कना खातिर लोग उरख्याळी गंजयाळी, धारा मंगरा पंदेरा, भूम्याळ, क्षेत्रपाल द्यवता, गौं द्यवता, पाणी द्यवता, बण द्यवता की बड़ी श्रद्वा से पूजा करदन। नाता रिश्तेदार अर नौकर्या अपणू घऽर मा कठ्ठी हुंदीन। आज भी गौं मा बग्वळी दिन हर घऽर मा स्वाळा पकौड़ा बणे जंदीन। रात मा थडया चौफळा गूंज पूर गौं कू वातावरण मा सुणन कूणी मिलदू। बग्वळी गीत की बयार कि झिलमिल दिवा जगी गैनि फिर बौड़ी ऐ ग्ये बग्वाळ’।

Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *