पुरणा दिन फिर बौड़ला ( गढवाळी कहानी)

पुरणा दिन फिर बौड़ला
दिनेष ध्यानी। 16 अप्रैल, 2021।
भौत साल बाद ऐंसु हमरा गौं म बैषाखी का कौथिग्या बान यथगा चैल-पैल अर उत्साह दिखणों लोगों म। गौं ता नि जै सक्यों पण गौं का भुला लोगों न जो वीड़ियो अर फोटो डाळि रैंन फेसबुक अर व्हट्सअप ग्रुपों म वों देखिकि लगणों कि सालों पुरणु रिवाज दुबरा ज्यूंदु होण लग्यों। एक उम्मी सी बंधेणी चा कि सैद हमरा घर गौं मा वु पुरणा दिन फिर जरूर बौडला।
पैल्या जमन भौना कौथिग्या घार-बूण सौब तैं भौत जग्वाळ रैंदु छौ। तीन चार मैना बिटिर लारा लत्यों को जुगत अर सिलाणां देणा फिकर रैंदि छै। जौंका अपणां पर्या बूण रैंदा छया वो अपणों खुणि सिनक्वळि लत्ता कपड़ा या त भेजि देंदा छया कि जब तलक हम औंला घौरा लोग सिलै द्याला या जो भग्यान हफ्ता दस दिन पैलि ऐ जांदु छौ घौर ता वो खुद ल्हे आंदु छौ। गरीब से गरीब बि हो पण भौना कौथग्या खुणि ता नै लारू जरूरि चा।
हम स्कूल्यों खुणि ददि अर ब्वै बाब बोलि देंदा छया कि तुम अपणु कौथग्या खर्च बनस्पता टीपीकि पूरू कैरि लियां। वां का खातिर सुबेर ल्हेकि ग्वाणों, कुपलरों अर जखि बि मौका लाग सार्यों बनस्पता टिपणां सुबेर सटगि जांदा छया अर बनस्पतों को दगड़ि हैरा हैरा पात अर क्वी जलडु बि मिलै देंदा छया कि सुखि कि वनज हो। बनस्पता सुखैकि फिर जग्वाळ रैंदु छौ सुंगरढाब गाड्यों का महेषा ब्वाडा जी को। वी एक मनखि छया जो गौं-गौं जैकि वै जमन म बनस्पता, मरच अर छुलरू ल्हेंदा छया। जै दि महेषा ब्वाडा गौं म ऐ ता फिर बनस्पता ब्यचणा रौंस लगीं रैंदि छै। वे से बि बिण्डया रौंस रैंदि छै कि कै का कतगा रूप्या बनस्पता बिकिन।
गौं म दिन रात कौथग्या तैयारि होण लगीं रैंदि छै। भितर लिपणां, उछ्यडणां अर सैन सफै से ल्हेकि ग्यूं कटै अर गौं म नंगर, दमौं की गूंज, सैर्या-सैर्या रात्यों गीत अर सिरणी की भ्यलि गूड बंटणु क्या समौ छौ, अहा वे जमना म दिनरात कौथग्या तैयारी अर हर मनखि का मन म बस एक ही सोर कि कौथिग्या तैयारि करण, सची घर गौं को उदमत्त माहौल तैं सची रंगमत बणै देंदु छौ सौब छ्वटा, बडौं की सहभागीदारी। गैस जळैकि रातभर गीत लगाणु एक तरफ ब्यठुला अर हैंका तर्पां च्यालों की टोली क्या रंगत रैंदु छौर दगड़म नंगर दमौं की गूंज सची क्या बुन तब। भौत बढिया जमनु छौ।
पड़खण्डै, मैरा, ढंगळगौं, भोपाटी, पोखार, यों गौं खुणि चैखत्या बुल्दा छया। पिपळया ह्वाया पिपळी खुवा गां का लोग। वे जमना म पिपळ्या-चैखत्यों की भौत टसन रैंदि छै आपस म कि कु पैलि देवी का थाळ म नंगर, दमौ ल्हेकि जालु? ये बारम भौत दौं लडै-झगड़ा बि ह्वैन। पुरण्य बतौंदन कि एक जमना म ता खूब मारपीट ह्वै। ल्वैख्वाळ कैरि देन एक हैंका गौं का लोग पिपळ्या-चैखत्यों न। बाद-बाद म पिपळ्या नंगर -दमौ नि ल्यांदा छया। पण चैखत्यों की धमक अर चमक सदन्नि एकसनि रै। बादम फिर पिपळ्या नंगर, दमौ लयाण बैठ्यां। अर फिर यी टसन ष्षुरू कि को पैलि देवी का थौळ म जालु नंगरू-दमौ ल्हेकि?
जब हम छ्वटा छया तब भी पिपळ्या-चैखत्यों कि टसन बणीं रैंदि छै। चैखत्यों तैं जग्वाळ रैंदु छौ कि मैरा राजु ऐ चा कि नि ऐ कौथिगि ख्यलणा खातिर गौं। अगर राजु ऐगे ता फिर पिपळ्यों कि खैर नी अर अगर जै साल नि ऐ ता फिर व बात नि रैंदि छै। को छौ यो मैरा राजु? श्री राजेन्द्र सिंह बिष्ट एसएसबी म श्रीनगर गढ़वाळ म नौकरि करदा छया। अहा दिखेण म क्या डीलडौल अर हौसला जनु बुलेंद अभि स्यादप्वाडै ढंया तैं उखाड़ि द्यालु। सफेद कमीज, काळि पैंट अर काळु चष्मा अर ढाल, तलवार ल्हेकि अगनै-अगनै सरां ख्यलदा जांदु रणबांकुरा देखिकि सौब कौथगेरों कु हौसला बढि जांदु छौ। भौना कौथिग से पैलि मैरा, पड़खण्डै या चर्चा होंदि छै कि बल ये साल बि मैरा राजु आणू चा कौथिगि म। बस फिर ता सौब जग्वाळ करदा छया कि कब जौंला कौथिगि।
भौत दौ यनु मौका ऐ कि पिपळ्या चैखत्यों से पैलि भौन देवाळा निसा पौंछि गेन नंगर दमौ ल्हेकि। अर चैखत्यों की टोली देवधार म पौंछि साकि ता फिर पिपळ्यों की हिम्मत नि ह्वै सकदि छै कि वो पैलि देवाळ म नंगर-दमौ ल्हेकि फ्यारा फेरि देन। वौं तै रैबार मीलि जांदु छौ कि चैखत्या पौंछण वळा छन। बस फिर वो देवाळा निसा ही नंगर-दमौ बजणा अर सरां ख्यलणा रैंदा छया। जब चैखत्या देवाळ म संरा खेलिकि अर फयारा फेरि देंदा छया तब पिपळ्या आंदा छया देवाळ म। असल म ये का पिछनै सैद यो गणित रै होलु कि चैखत्यों तैं लगदु हो कि देवी हमरा इलाका म चा ता पैलि हम हमरू चा। पिपळ्यों को बुलणु छौ कि कै जमना म वो पिपळी ढंया म आंदा छया नंगर-दमौ ल्हेकि ता देवी की घांडि अफी बजि जांदि छै। ता वों को मनणु छौ कि देवी हम परैं प्रसन्न चा ता पैलि हक हमरू चा। हौरि बि क्वी बात ह्वै सकदा पण जख तलक हमुन समझि कि जैकु धाडु दगडु वैकु दावा तगडु।
कै बेरि यनु बि ह्वै कि देवाळ म फ्यारा फिराणा बाद लोग कौथिगि ख्यलण बैठिगेन। ता अचणचक लोगों का बीच पिपळ्या नगंर दमौ ल्हेकि सरां ख्यलण बैठिगेन। ता वों का समणि ही चैखत्या बि अपणां गाजा, बाज ल्हेकि नंगर दमौं का दगड़ि संरा ख्यलण बैठिगेन ता वख म बि टकराव की नौबत ऐगे। तब द्वी तरपां बड़ा बुर्जुग बीच म ऐकि चुप करौंदा छया। पण मैरा राजु का होंदा कैकि हिकमत नि होंदि छै कि चैखत्यों परैं क्वी नजर बि उठै द्या। गौं का नौकर चाकर अर फौजी जवान जब घौर आंदा छया कौथिग ख्यलणा खातिर तब घर गौं की रंगत हि हौरि ह्वै जांदि छै। द्वी गति बैषाख भौना कौथिग बिटिन चैदा गति जेठ र्योवा कोथिग तलक घर गौं रंगत बणीं रैंदि छै। भौना कौथिग, कुंड्यला कौथिग, ष्धुमाकोटा कौथिग, तोल्यूं सिद्दा कौथिग, कठुळ्या कौथिग, सिमळा सैंणा कौथिग, चैड़ा कौथिग, असन्यता कौथिग, अदळिखाळा कौथिग, बूंगीदेवी कौथिग अर झणि कख कखा कौथिग जांदा छाया लोग। अपणां पर्यों तैं भेटंणा अर मिलणा खातिर। वै जमना म ब्यौ खुणि नौनि, नौनु द्यखणु हो ता कौथिग भौत बढिया अवसर देंदा छया।
कौथिग म सौरस्या बेट्यों की रूवै अर ह्यळि गाड़िकि टौखणि मरणु अहा कनु पराण तैं कचोटि जांदु छौ। वै जमना म बेटि-ब्वार्यिों खुणि दुख अच्छे होदु बि छौ। गरीब जमनु छौ, आदिम नौकरी खातिर परदेष अर घौरा जिम्मेदारी सौब जनन्यों का कंधों परैं अर वां म बि सासु बि दिनरातै गाळि अर ककडाट सो अलग। क्वी भग्यान सासु रै हो जो बौड़ि तैं जळीं, कटीं नि सुणांदि रै हो नथर संगति एकसनि हाल छया। अमणि ता जमनु बदलेगे। न खेती न काम काज अर सासु बिचरि चपु अर घौर बूण बेटी-ब्वार्यों को राज। वै जमना म दिनरात खपणु अर कामधाम करणु ही जीवन छौ।
भौना कौथिग म पुंयाबाज,चर्खी अर सुर्रा कि कट्वरि, छोला, जलेबी, अर बिंदी, चूड़ि, फूंदा, कुंजा,गट्टा, गुबरा, अर झणि क्या-क्या। यनु लगदु छौ जनु बुलेंद सैर्या दुन्या समान अर दुकान यखि ऐगे होलि। पण कीसावोंद रूप्या कम होंदा छया इलै भौत चीजों तैं दूर बिटिन देख्किि ही खुष होण प्वडदु छौ। एक रूप्या, द्वी रूप्या या भौत हो ता पांच रूप्या कौथग्यार खर्च मीलि हो ता वै म अपणां मना सौब स्याणि कनम पूरि कै सकदा? फिर मन म यन बि रैंदु छौ कि घौर वळों खुणि बि कुछ न कुछ ता भुला, भुल्यों खुणि एकाध पुंयाबाज त ल्हीजाणु चा अर जरसि कुंजा गट्टा सै। हां गुच्छी ख्यलणा बि बजट होंदु छौ कि मिन बीस पैसौं गुच्छी ख्यलणी जीति गे ता हौरि बि ख्यललु अर हारि गे ता बीस पैंसा हि सै। पण बिण्ड्या दौं द्वी चार रूप्या जीति ही जांदु छौ ता फिर एक पान खै कि काळा चष्मा आंख्यों परैं अर चर्खी म बैठणा को आनन्द ही कुछ हौरि होंदु छौ। जबरि चर्खी अगास जांदि छै ता यनु लगदु छौ कि बुलेंद मी बरौबर बडु क्वी नि हो।
थड्या गीत, चैंफळा अर भंेट, भिंटोली क्या गजप माहौल रैंदु छौ कौथिग्या। सच बात या चा कि घौर आणा ज्यू नि ब्वलदु छौ। अमणि जमनू बदलेगे। घर गौं म मनखि कम रैगेन। बिण्डया लोग पलैन कैरिक चलि गेन। पण जो भग्यान गौं म छन वो अपणि रीति, परम्पराओं तंैं सहेजणां छन अर दुबरा फिर से हम जना लोगों तैं याद दिलौणां छन कि अगर हम सौब चैंला ता पुरणा दिन बौडै सकदां। हम सौब कुछ पुरण जमना तरां नि कैरि सकदा पण भौत कुछ कैरि सकदां। बस जर्वत च अपणां घर, गौं, समाज अर परिवेष तैं समझणा को अर सौब तरपों बिटिन गौं तैं आबाद अर पुरणि रीति-नीति परम्पराओं दगड़ि जोडी रखणा कि। यो काम आसान बि नी पण मुष्किल बी नी।
त उम्मेद कर्दां कि हैंक साल ये से बि बडु कौथिग जुडलु अर हमरा अपणा जो बि देष परदेष छन सौब अपणां घर गौं जरूर बौडला। ऐसो को उलार देखिकि उम्मीद चा कि हमरा घर गौं का पुरणा दिन जरूर बौडला।

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