संजी तू कख छै……..?

(सत्य घटना -केवल पात्रों के नाम बदले गये हैं ।)  
पहाड़ –!!!!नशा एक अभिशाप !!!!

इबरी दाँ मकरेणी मेला म जाणकु सौभाग्य 
प्राप्त ह्वाइ , 13 तारिक जनवरी देरादून बटि गाड़ी लेकि गोंकू थे रवाना हुयां । साँगुडा़ भुवनेश्वरी मंदिर म रात बासा रयाँ  ,14 तारिक गिन्दी कु तमशु देखी, अर् बेखन गों म अपणी कूड़ी म विश्राम का वास्ता पहुंच ग्याँ। मी दगड़ मेरु एक भतिजु बि छौ । रात द्वियोंन मिलिकि खिचड़ी बणाई ।
,बिन्डी थकावट हूण से सन्कोली से gयाँ ।
अचाँचक रात 11 बजि मोबाइल की घंटी बजी ,कॉलर कु नाम कमला देखी । मिन सियां म सोचि मि देरादून म छों ,मेरी जेठ सासु कमला याद करणी,याँकू मतलब वीन्का उपद्रवी छोरन क्वि कांड कैरयाल।
डरद डरद फ़ोन उठाई ।
तख बटि आवाज आई “चाचाजी तुम गों अयां छाँ ??? । मि कमला बोनु छों । संजी अबि तक घंडियाल बटि घौरे नि आयी । वेक फोने घन्टी बजणी च पर उठाणु नीच ,कैन मारियाल वु ?? फ़ोन करद करद व रुण बैठ गया ।

पात्र परिचय :-

(1. कमला बहुत सालों से मायका म रैन्द उम्र लगभग 55 , संजी 60 और यूँ द्वियों दगड़ माँ की उम्र 90+ , संजी यूँ द्वियों कु एकमात्र सहारा च।
2.मांजी थे सेवा लगा, अपणु परिचय दया , दगड़म  टुटीं फुटीं भाषा म बातचीत करद,  हुन्गरा भोरद, फेर अद घंटा बाद पुछ्द   “तू कु छै ??? )

घटना क्रम जारी :-

मेरी स्थिति अजीब सी ह्वेग्या ।मि असमंजस्य म
पोड़ ग्यों !!!! क्य करू ,रात 11 बजि ,वु बि सर्दियों की रात ,बाघे डौर अलग ????
मि ठैरु प्रवासी आदिम !!!!!
  थोड़ा साँसु कैरि !!!मिन वींकु बोलि “तू फिकर नि कैर मि कुछ करदु छों ।
मिन अपण भतीजा थे झंजोडी़,जु एकदम गहरी निंदम सियूँ छौं ।सरा कथा सुणाई ।
वेन बोलि इन कर तुम गणेश चचा कु फोन लगा
वु गों म होलु वेकी मदद लेंण पड़ली ।
मिन गणेशकु  फ़ोन लगाई ,भाग्यवश वेन उठे दया ,सर कथा लगाई ,वु दगणम चनु तैयार ह्वेग्या ।एक मीटिंग पॉइंट निश्चित करे ग्या। 
          गणेश भाई अपणि कुल्हडी़ ले कि घना का रास्ता तिराहा पर पोंछ ग्या। जानवरु की डौर त पहाड़ म हून्दी च । ठण्डन हडगा कंपणा फेर बि हम द्वी टोर्च अर् एक सोडगी हथम लेकि वखि पौंछ गयाँ।
          अब हम तिन्नी गस्त लगाणु स्कूल कु रस्ता पकड़ी ।वख बटि मेन रोड फर चलण लग्याँ । झाडिय़ों म,बुझ्यौँ म,भेल तबें ,सड़का ढीस-तीर खोजाँद खोजाँद घंडिय़ाल तक पौंच ग्याँ । वख बटि फेर मिन संजी कु फ़ोन मिलाई ।
किस्मत से फ़ोन लग ग्या । मिन पूछी ,
तू कख छै ?
उन्हें बटि फ़ोन फर कणाट सि सुण्या ।
मीथे एक आशा कि किरण नजर आइ ।
मिन फेर बोलि “संजी मि चचा बोनु छौं, अबि तू कख छै ?????
वेन बोलि “मि घोरम छौं “
ये सुणि मि दुविधा म पोड़ ग्यौं।हमरि कु गत ह्वेग्या अर् यु आराम से घौर पोड्युँ च ।
मिन फेर बोलि “अबे तेरा घौर बटि अबि हम आणा छाँ” तू अपणि लोकेशन बतौ ।
कैक बूबा कि लोकेशन !!!!
वे कु फ़ोन फेर बंद ह्वेग्या ।
थोड़ी देर बाद हमन गों जाणकु दुसरु रस्ता पकडी़ ।थुन्नी दिदा का घौर बटि घना की तरफ।
मिन गणेश खुण बोलि “अब तू फ़ोन लगो “
गणेशन फोन लगाई ………
टर् टर्टर् टर् टर् टर् टर्
हेलो ..……संजिन फ़ोन उठे द्या ।
गणेश “संजी तू कख छै ????
संजी “मि घौरे छों,पर मीथे भौत ठंडी लगणी च !!!!! (शायद वे कु नशा उत्यार फर छौ ।)
गणेश “अबे तू घौर नि छै ,तू कख छै सच सच बतो ।
संजी”मि घौर का नजदीक छौं ,पर पता नि कख छौं ????
अब इथ्गा हमरि समझ म बि एगया कि येकी दारू उतरण  बैठ ग्या ।
यू कै बुज्य बटि बोनु च !!!!!
उंद्यार चलद चलद अचाँचक दूर मिन देखी, क्वि   दूसरी पार्टी टोर्च ले कि,संजी की खोज म मुड़ी बटि आणि च ।अग्ने बड़द-बड़द  हम वीं लाइट का समण पहुँचयाँ ।देखी त व संजी क मोबाइल की लाइट छै ।साइड म कटोरी कांडा बुज्य संजी पोडयूं छौं ,हमन राहत की सांस ले ।
गणेशन संजी थे उठाई ,कंधा का सहारा गों की तरफ हिटण बैठ गयाँ।
संजी “हम कहाँ जा रहे हैं “
(जैसा कि दारू पीके हर पहाड़ी हिंदी और अंग्रेजी ज्यादा बोलता है ।)
गणेश “त्वेथे व्यास घाट लिजाणा छाँ ।
संजी  -“किले”
गणेश – तू मोर गे तेरु दाह संस्कार करणू । (विषम परिस्थितियाँ और पीड़ा में भी हास्य उत्पादन)
संजी “खामोश” था ।
कै बि तरों हम वेका घौर पहुँच्याँ।

रात 1बजे उम्र 90+ 
माँ बैचैनी मे अपने कमरे मे चहल कदमी कर रही है।हम सब लोगों की और संजी की आवाज शायद उसके कानों तक पहुंच गयी वो निश्चिंत हो कर अपने बिस्तर पर लेट गयी ।

मुझे मुनव्वर राणा साहेब की दो पंक्तियां याद आ गयी @@@!!!

“ये ऐसा कर्ज है,
जो मैं अदा कर नही सकता ।
मैं जब तक घर न लौटूं ,
मेरी माँ सजदे में रहती है “।

“खुदा ने ये शिफत,
दुनिया की हर औरत को बख्शी है ।
वो अगर पागल भी हो जाये,
तो बेटे याद रहते है” ।

मातृ शक्ति को नमन ।

Nirmal Naithani
8126213830

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