सौ नाली जमीन – हरीश कंडवाल “मनखी”

अजकलि पहाड़ मा कुच्छ लोग अपणी जमीन रसूखदार लोगू तै बिचणा । जु लोग पहाड़ या गढ़वाल छोड़ी भैर बसि गेन उ लोग कुच्छ रुपयों लालच मा अपणु पुरखु जमीन तै कौड़ी भाव इन बोली बिचणा कि यि बांझ ह्वे गेन अर अब हमर क्या काम रै गेन कुच्छ हत्थ त आल। अर जै तै या जमीन बेची आज उ वख अपणु बिजनिस चलानु अर करोड़ो रुप्या कमाणा। पहाड़ मा अब पहाड़ी नि मिलण हवाल। ये पर या कविता लिखी। आप लोग यी कविता तै जरूर सुणली। येक दगडी हमरु रन्त रैबार तै सब्सक्राइब भी करिन अर कविता पसंद आली त शेयर अर अपणु राय जरूर देन।

उत्तराखंड के पहाड़ के गांव में जमीन की कीमत ना पहचानना ओर उसे माफियो को बेचने पर वालों पर तंज करती गढ़वाली कविता।
हरीश कंडवाल “मनखी”
शीर्षक – सौ नाली जमीन।
कविता और आवाज हरीश कंडवाल “मनखी”
भाषा गढ़वळि।
साइकिलवाडी दिवोगी किमसार यमकेश्वर पौड़ी गढ़वाल।
एडिटर – अमित अमोली | Amit Amoli
रन्त रैबार पोर्टल
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