20 साल भुगती उस जुर्म की सजा, जो किया ही नहीं था, अब हाईकोर्ट ने किया रिहा, ट्रायल कोर्ट को दी ये सीख

एक लड़की के अपहरण के दोषी करार दिए गए हरियाणा के दो लोगों को 20 साल बाद इंसाफ मिला है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने दोनों को दोषमुक्त करार देते हुए कहा कि पुलिस ने केस साबित करने के लिए झूठी कहानी गढ़ी। ट्रायल कोर्ट ने भी इस मामले में गंभीरता नहीं दिखाई और सजा सुना दी।

मामला 2001 का है। सोनीपत निवासी 14 साल की एक लड़की ने पुलिस को शिकायत दी थी कि दो युवकों ने उसे अगवा किया और उसके साथ गलत काम करने की कोशिश की, लेकिन शोर मचाने पर वह भाग गए। इस मामले में पुलिस ने 7 जुलाई 2001 को एफआईआर दर्ज की।

11 अगस्त 2004 को सोनीपत फास्ट ट्रैक कोर्ट ने दलबीर और बिशन को 2 साल की सजा सुना दी। इस सजा को चुनौती देते हुए दोनों ने 2004 में हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। 4 साल ट्रायल कोर्ट में और 16 साल हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार हाईकोर्ट से अब उन्हें इंसाफ मिला और दोनों को बरी कर दिया गया।

महिलाओं के प्रति अपराध में संवेदना बरतें लेकिन न्यायशास्त्र का स्वर्ण सिद्धांत न भूलें 
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में अभियोजन पक्ष की कहानी शुरू से ही कमजोर रही है। पीड़िता लड़कों के साथ जाते हुए जरा भी नहीं चिल्लाई, पीड़िता के अनुसार उससे कुछ गलत नहीं हुआ तो उसके अंतरवस्त्रों पर सीमन कैसे मिला। पुलिस ने दोबारा जांच निजी डॉक्टर से क्यों करवाई। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने इन पक्षों पर गौर ही नहीं किया। भले ही मामला महिला के प्रति अपराध का है, लेकिन अदालतों को इन मामलों में संवेदनशील होने के साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अपराध न्यायशास्त्र का स्वर्ण सिद्धांत न टूटे।

यह है अपराध न्यायशास्त्र का स्वर्ण सिद्धांत
अपराध न्यायशास्त्र के स्वर्ण सिद्धांत के अनुसार आरोपी को स्वयं को निर्दोष साबित करने से अहम यह होता हे कि अभियोजन पक्ष आरोपी पर अपराध साबित करे। अपराध साबित करते हुए इसे किसी भी तरह के शक से ऊपर होना बहुत जरूरी है।

 

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