एक जन द्वियूका मन

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न रै साकी. न सै साकी. फ़िर किलै धै लगैन.!
गारा सि बिनैन जु. फ़िर किलै मन मा बसैन.!!
ऊ भी रैन चालक. धै लगैकि मी बोगाणा रैन.!
सेरेक सुख का दगड मी दूणेक दुख दे गेन..!!
राई रूणू सदनि .किलै ऊ म्यारा गल्ला भिटेन.!
अदगल मा छोड़ी. निर्भेगी मी अधम्वरू कैगेन.!!
जै फ़रि बोटि अंग्वाल. मिन जु अपणा चितैन.!
लमड्यू देखी मी जना. ऊनी अपणी पीठ फ़रकैन.!!
जब ढब छा यखुलि रैणु. ऊ ऐकि दगुडु कैगेन.!
जनि ढब आई दगडा कु. निर्भेगि फ़िर यखुलि कैगेन.!!
अयान त छाई मेजाण. कुछ बुलुण रै होलु मीमा.!
मि सारु लग्यू रौ. उ भी जब तै रैन चुप ही रैन..!!
खर्वाल च जनि मिन. जुकडी कु रंगुणू अपणू .!
ऊ फ़िन्डका बणी. आज भी जगणा रैन ..!!
अब त वर्ष बीत गी. दूर जयाँ मी दगड भटि.!
फ़िर मी याद ऐ गेन .आज फ़िर रुवै गेन…!!
ह्वाया भी छीन अलग. कुछ यन अगल ह्वेन.!
न उ बिसरीन मिथै. न मिन कभी ऊ बिसरैन .!!
आँखि त ऊँकिभी. लुकाणी रैन आँसु मीजन.!
मि रोऊ भिटेकि.ऊभी छकैकि दगडी रवैन….!!
झणि किलै वगतन. हम थै यन दिन दिखैन!
न रै साकी. न सै साकी. फ़िर किलै धै लगैन.!
सन्दीप गढ्वाली ©®

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