ऊमी ( गढवाळी कहानी) मनखी कलम बिटी

ऊमी

सूरज अपर नौंन्याळ लेकन गांव मा अपर कुटुम्ब क भतीज ब्यो मा अपर बाल बच्चों तै लेकन भी ग्यायी। घर मा माँ पिताजी रै करदन, उ कुणी खटे मीठे अर अंगूर केला भी थैला मा धरी कन लयूँ छ्यायी। सूरज बेटी स्वाति अर नौन अमन द्वी गांव मा जैकन खुश छ्यायी। बिटुल घर राव या बण उ हत्थपिंडया भांडु ह्वे करदू। स्वाति अपर दादी दगड़ी हत्थ उसारी दे करद, वखि अमन अपर बुबा फोन पर दिन भर वीडियो गेम खिलण मा मस्त। सूरज ब्यो मा अयू छ्यायी त उ वखि काम कन पर लग्यू। सूरज घरवळी रीना भी चौक चूल्ह सम्भलण मा लगी छेयी।।
इने सूरज माँ की द्वी पुंगड़ी पर ग्यो बुत्या छ्यायी, उ जरा जरा गगरण ह्वे गे छ्यायी, कुछ अगा पकी गे छ्यायी, उ तै लौणन बटोळण नाती नतणा तै लेकन पुंगड़ी मा चली ग्यायी। अपर पुंगड़ी अपर घर, अपर गौड़ी इनि हूंद जब चली जाव कुछ ना कुछ जरूर दे दे करदन, कभी निराश नि करदन, अगर उ तै आबाद रखयूं ह्वाव त।

दादी न पैल पक्या ग्यो कटिंन अर पूळ बणे कन स्वाति अर अमन मा पकड़ाणी रायी, एक बिठीक ग्यो काटी अर वेक बाद द्वी पूळ गगरण ग्यो बलड़ चिलो समेत कटीन, अर घर लेकन ए ग्यायी। अगयर मा चिलो अर सुख्यू घास मा आग लगे, अर ग्यो बलड़ वे मा भड़याणा कुणी डाळ देन, घड़ेक लठूल न उ तै हरके फरके कन,वेक बाद गरम गरम बलड़ सूप्प मा टीपीन अर उर्खयलू मा खैर की गंजयळी न कूटी कन ग्यो अलग अर बूस अलग करि द्याय। तबरी स्वाति भी ए ग्यायी, वीन दादी तै कूटण अर फटकण द्याखी त वीन भी गंजयळी ल्याय अर कूटण कोशिश करि पर खैर गंजयळी गर्री छेयी त अळगे नि साकी।

दादी न ब्वाल रणी दे बाबा, त्यार बसोक नि छ, मि अफिक कुटुलू। वैक बाद सूप्प मा फटकी कन द्वी चार बीज नै नवाण कि कूड़ मुंडळ मा डळीन, तब स्वाति अर अमन तै एक एक मुट्ठी भुखाण कुणी दे दीन, द्वी बच्चों न खूब चाव से बुखैन अर दादी तै पूछी कि यी क्या चीज छ, तब दादी न ब्वाल बाबा यी ऊमि छन, अब त क्वी नि जणदू, जणन भी कखन च जब पुंगड़ी बांझी पड़ी छन, अब त एथर ग्यो सट्टी कन हूदिन नै पढ़वळी तै क्या पता लगण जब 5 अर 10 किलो थैली घर मा आटू आणा।
वैक बाद ब्यो निभे कन जब सूरज वापिस दिल्ली आयी त दगड़ मा माँ क दिया ऊमी भी लायी, स्वाति अर अमन न फोन पर अर सोशल मीडिया मा स्टोरी बणे कन ऊमी फ़ोटो डाळी कन अपर खुशी बताई, तब उक दगड़या उ तै पूछणा रैन कि क्या चीज च यू तब उन बते कि या ऊमी च, दादी जी न मेहनत अर बड़ो लाड़ प्यार से बणेन। सब्बि फ़ोटो देखि कन ब्वाल कथगा भगयान नाती नतणा अर ददी ददा छन।

हरीश कंडवाल मनखी कलम बिटी

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