बग्वाळ-इगास हमरि लोक परम्पराओं तैं संजौणा तिवार , इगास पर वरिष्ठ साहित्यकार दिनेश ध्यानी आलेख

हमरा पहाड़ म छवटि दिवाळी खुणि बग्वाळ बुल्दन। दिवाळी से पैल्या दिन बग्वाळ मनये जांद। लोग भूड़ा, स्वाळा, खीर अर भांति-भांति का पकवान बणौंदन। घरों म दिया अर मोमबत्ती जळौंदन। अर लोग रात गौं म इकट्ठा हेांदन अर सब्बि मिलिकि भैलु ख्यलदन। ये दिना खुणि नरक चर्तुदशी या यम चर्तुदशी बि बुल्दन। बुल्दन बल ये दिन भगवान श्री कृष्ण ला नरकासुरौ बध कै छौ। तबी ये दिना खुणि नरक चर्तुदशी या यम चर्तुदशी बि बुल्दन। ये दिन लोग गौड़ि, बल्दों का सींगों परैं तेल लगौंदन, तैं टीका लगौंदन, वों का खुटा धुंदन अर वों तैं पींडु खिलौंदन।ये दिन हैळ नि लगौंदा। सुबेर गौड़ि, बछरा अर बळ्दों तैं पीडुं पाणि खलैपिलैकि चरणा खातिर जंगळ भेजि दिदन। दिनभर गोर चरणा रंदन अर फिर ब्यखुनि दौं अपणा गुठ्यार म ऐ जंदन।

यो ता ह्वे बग्वाळै बात। अब आप तैं बथदौं इगासै बात। हमरा लोक म हर तिवार अर रीति रिवाजा खातिर लोक कथा अर लोक किंवदतीं छन।


बुल्दन बल एक गौं म एक मवासा का गुठ्यार म गौड़ि, बल्दों का दगड़ि एक बोड़ छौ जैकु नौ छौ झल्या बोड़। वो भौत नटखट अर चंट बोड़ छौ। बग्वाळा दिना बात चा वीं मवा ल सब्बि गौड़ि, बल्दों तैं गुठ्यार म पींडु, पाणि खवै, सब्यों को संिगों परैं तेल लगै, वोंकि पूजा कैरि अर वों तैं ड़ांडा चरणा खातिर हकै देन ग्वैरा का दगड़ि। पर झल्या तैं म्यलणों बिसरि गैन। वो बिचरू छनुड़ा भितर हि बंध्यों रैगे। जबरि गोर ड़ांडा जाणा छया तबरि झल्या रामि बि च पण कैन वैकि आवाज नि सूणि। जब गोर ड़ांडा पौंछि गैन तब पला चालि कि अरै झल्या ता घौर म हि रैगे।


तब आनन-फानन म ग्वैर छानि म गै अर झल्या तैं मेलिकि जंगळ ल्हे ऐ चरणा खातिर पण यीं रकारोड़म वैका सिंगों परैं न त कैन तेल लगै, न वैकि पूजा कै अर न वै तैं पींडु पाणि खवै। बस तता कैकि ल्ही गैंन ड़ांडा चरणा खातिर। य बात झल्या का मन म बैठि गे अर वो रूसै गे। इलै झल्या हौरि गोरों सै अलग दूर जंगळा भितनै चलिगे। अर जांदा-जांदा कतना दूर पौंछि गे य बात झल्या तैं बि पता नि चलि।
इनां ग्वैर जबरि शाम दों गोरों तों घरबौडु कना खातिर धै लगैकि बुलौणा छया ता वोंन देखि कि सबि गौर ऐगेन पण वो झल्या अज्यों तलक नि ऐ। वोंन सोचि ऐ जालु पण काफी देर बात बि जब वो नि ऐ तो ग्वैर वै तैं इनां, उनां जंगळ म ख्वजणा रैन पण झल्या छौ कि कखि दिखे नी। टौखणि बि मरीन, धै बि लगै पण झल्या ता कखि बिटिन रमणों बि नि लग्यों । रात होण लगीं छै जगंळ म बाघ, स्यू कि डैर अर घौर वळों तैं फिकर होलि कि गोर अर ग्वैर किलै नि बौड़ा अज्यों तलक यी सोचिकि ग्वैरों न सोचि कि हम गोरों तैं ल्हेकि घौर चलि जंदन। झल्या तैं ख्वजणा खातिर बाद दिखे जालि।
ग्वैर गोरों तैं ल्हेकि घौर ऐगेन। घार वळों जब पता चालि ता वोंन ग्वैरों तैं खरि, खोटि सुणै कि बोड़ कख हरचैदेन? रात लोग लालटेन बाळी, गैस बाळी झल्या तैं ख्वजणां खातिर जुगळ गैन। अध राति तलक झल्या तैं खोजि पण झल्या छौ कि कखि दिखे नी।
तै दिन बिटिन लगातार झल्या तैं ख्वजणा रैंन पण झल्या छौ कि मीलि हि नी। लोगोंन सोचि कि सैद बाघन मारि यालि हो। पण बाघ बि मरदु ता कखि वैका हड़गा ता मिल्दा। सबि अचरज म छया कि गै चा ता गै कख चा झल्या? न यंी ढंया, न वै पाखा न तै रौला पण लोगोंन बि झल्या तैं ख्वजणु जारी राख।

एक दिन जब ख्वजदा दूर जंगळ म पौंछी ता वोंन देखि डाळों का झुरमुट का निसा एक गदनि ब्वगणीं अर समणि झल्या खडु चा। लोगों ने देखी ता वख आपरूपी शिवलिंग बि वों तैं दिखे। वै हि शिवलिंगा समणि झल्या एकटक खडु हुयों छौ। लोगोंन व जगा साफ कैरि, शिवलिंग मा पाणि चढै अर झल्या तैं घौर ल्हेऐन।
झल्या तैं घौर ल्हाणा बाद कै दाना सयाणा न बोलि यु बोड़ हर्चि नी चा। तुमन वैकि गयळि कैरि, बग्वाळा दिन न तुमन झल्या तैं छनुड़ भितनै बिटिन न म मेलि अर न वै तैं पींडु, पाणि दे, न सींगों परैं तेल लगै इलै वो रूसै गे। तब वे दिन झल्या पूजा करेगे, वै का कुंपळा सिंगों परैं तेल लगये गे अर वैकि पूजा करेगे। किलैकि झल्या यकुलु बोड़ छौ जैकि ये दिन पूजा करेगे, पींडु, पाणि दियेगे अर सिंगों परैं तेल लगये गे इलै ये दिना नौ पोड़ि इगास मतलब इ माने यकुलु अर गास माने जै तैं गास या पेंडु, पाणि खाणु दियेगे। तब ये दिना खुणि इगास बुल्दन। बग्वाळा बाद बारा दिन बाद मीलि छौ झल्या तबी ये दिना खुणि इगासा रूपम मनये जांद।
हमरा लोक जीवन अर लोक परम्पराओं म भौत कुछ चा जो सौब से अलग अर अनुकरणींय चा। हमरा पुरण्यों न जो परम्परा अर तीज तिवार बणाया छया वों का पिछनै लोक हित अर लोक परम्पराओं तैं अगनै बढ़ौणा विचार खास छौ। इगासा कहानि कखि अलग रूपम बि होलि अर वखा लोक वै तैं अलग रूपम प्रस्तुत कर्दौंलु पण भाव सब्यों को एक ही चा।
अमणि ता घर गौं म लोग दूध नि देण वळि गौड़ितैं जंगळ बांधिकि औणा छन। भ्याळु द लमडै देणा छन अर वों का गिच्चों परैं प्लास्टिका पन्नी बांधि देणा छन ताकि न त उज्याड खौ अर न हम तैं गाळि मील। हम देवभूमि का मनखि कतना स्वार्थी अर र्निलज्ज बणि ग्यों? जैं गौड़ि से हमरू ज्यूणु-म्वना सारू छौ, संस्कार छया वीं गौड़ि कि अमणि यनि कुदशा? सोचिकि मन खराब सि होंद। जब समाजा यनि कु दशा अर भ्रष्ट सोच होलि ता वख क्या इगास अर क्य बग्वाळ पण फेर बि हमरि संस्कृति चा अर हमरा पुरण्यों का रीति, रिवाज छन। स्वचदां के सैद मनख्यों का मन बदलेला अर वो गौ वंशा यनि गयळि नि काराला।

अमणि हम लोग अपणा घर,गौं बिटिन इनां, उनां बसणा छंवा। दीन, दुन्या म हमरा अपणा लोग बस्यां छन। सब्यों से हमरि हथ जुडै़ चा कि अपणा रीति, रिवाज, तीज, तिवारों तैं नि बिसर्यां।यों से बोर नि हुयां। किलै कि हम कतना बड़ा बि बणि जौंला, कखि बि पौंछि जौंला पण हमरा जलड़ा जब तलक हमरा दगड़ राला तबी तलक हम उत्तराखण्डी छंवा। तबी तक हमरि पछ्याण बची रालि। इलै अपणि नै पीढ़ि तैं अपणी परम्परा सिखाणु अर वों तैं हस्तातंरित कनु बि हमरू फर्ज चा। त आवा हम अर आप अपणि लोक परम्परा को तिवार तैं मनंदा अर अपणि भाषा, संस्कृति कि रख्वाळि बि कर्दां।

आप सब्यों तैं सपरिवार अर इष्टमित्रों समेत इगास -बग्वाळा भौत-भौत बधै अर शुभकामना छन।

यो लोक परम्परा को लेख हमुन पण्डित सत्यप्रकाश रत्यूड़ी जी से वार्ता का आधार परैं लिखे गयों चा। रत्यूडी जी को बि आभार।

लिखवार वरिष्ठ साहित्यकार श्री दिनेश ध्यानी।

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