उत्तराखंडी लोक पर्व रूटळया त्यौहार आवा जाणौ ये बाबत

जन जन हम आज नै जमन तरफ दौड़ना छवां लेकिन दौड़द दौड़द इथगा ऐथर चली ग्यवां कि अपर रीति रिवाज, अर बार त्यौहार भुलद जाणा छंवा, जबकि हमर सब बार त्यौहार सीध प्रकृति से जुड़दन। चाही उ हरेला ह्वाव या फिर घी संग्राद ह्वाव या क्वी होर त्यौहार।
आज सब्बी लोाग हरेला त्यौहार धूम धाम से मनाणा छन, जगह जगह डाळी रोपण हूणा छ। लेकिन एक इन वार त्यौहार भी छ, जै तै जैसे हमन पूर्ण रूप से भुले दिये ग्यायी। आज मी बात कना छौ कि रूटळया त्यौहार की। सौण मैना सग्रदी पैल दिन अर आषाड़ मैना आखिरी दिन जै कुणी सेख बुल्दिन वै दिन मनये जांद, शैद नै पढवळी तै यी त्यौहार पता भी छा कि ना।
ये दिन सब्बी घरों मा उडद, गहथ, रयांस, लोबिया जू भी दाळ घर मा हंूद छेयी वै तै उसै कन वैकी भुरीं रूट्टी बणै कन घी दगड़ी खये जांद छेयी। किलैकि तबरी तकन सब्बि दाळ पुंगड़ पर पैली बुये दिये जांद छेयी, अर पुंगड़ मा दाळ नै फसल पर फूल ऐ जांद छ्यायी।
छूसर जू रूटळया त्यौहार मनाण मुख्य कारण छ, खरीफ फसल कौणी। यी एक पहाडी अनाज जू झंगोरा प्रजाति क छ, ये पर झंगोरू से पैल बलड़ ऐ जदीन। ये कारण जब कौणी पर बलड़ ऐ जदीन त फसल बढिया हूण संकेत मिलद छ्यायी। कौणी पर बलड़ हमेशा सौण मैना संग्रदी से पैल ऐ जै करदन।
एक तरफ बरसात मा जब सब्बी जगह आल (नमी) कारण बीज जमण लग जदीन। त हमर कुछ निरमसी (शाकाहारी ) चखुल जन घिण्डुड़ी घुघुती जणी चखुल कुणी भोजन अकाळ ह्वे जांद, तब या कौणी प्रकृति मा उंक भोजन अकाळ ह्वे जांद या कौणी प्रकृति मा उन भोजन एक मात्र सहारा छ।
पैल जमन मा सौणा मैना पवित्र मैना मने जांद, यूं चखुल तै जिमाण क भी प्रचलन हमारे पहाड़ी क्षेत्रों मा खूब छ्यायी। यूंक भोजन व्यवस्था लोग अपर चैक मा चखुलु कुणी नाज दाण डळै जांद। आज जख घिड़ुणी तै बचाण बाबत मुहीम लोग चलाणा छन जू बौत सुंदर छ, लेकिन हमर वार त्यौहार पैल बिटी प्राकृतिक संन्तुलन बणयंूं रखणा मा सहायक छ्यायी। कौणी एक बौत पौष्टिक अनाज छ। यी कैल्शियम एक अच्छू स्रोत छ अर येमा सबसे ज्यादा मात्रा मा फाईबर ह्वे करदू। ये से चैंळ कणकील अर आटू बणये जांद, यी शुगर मरीजू कुणी बौत फैदामंद छ।
कौणी आज एक विलुप्त प्रायः अनाज ह्वे ग्यायी। बहुत से लोग शायद ये अनाज नाम से परिचित भी नी ह्वाल, लेकिन येक मुहिम हम तै अपर पारंपरिक नाज तै बचैण की भी चलाण जरूरत छ।

  लिख्वार-  अंजना कंडवाल “नैना”

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